Friday, 23 March 2012

सुखी दाम्पत्य जीवन व टोटके,वे नौ महीने: क्या करें, क्या न करें,पति-पत्नी में प्रेम बढ़ाता है यह मंगर्भधारण कैसेत्रस्वास्थ्य के लिये टोटके


यहाँ कुछ ऐसे सरल टोटके बताये जा रहे हैं जिन्हें अपना कर अपने दांपत्य जीवन को सुखी बनाया जा सकता है|
  • जिन महिलायों के पति अधिक शराब का सेवन करते हैं तथा अपनी आय का अधिक हिस्सा शराब पर लुटातें हैं,उनके लिए यह सब से सरल उपाय है|जिस दिन आपके पति शराब पीकर घर आयें और अपने जूते और उनका जूता अपने आप ही उल्टा हो जाये तो आप उस जूते के वजन के बराबर आटा लेकर उसकी बिना तवे तथा चकले की मदद से रोटी बनाकर कुत्ते को खिला दें|कुछ ही समय में वह शराब से घृणा करने लगेंगे|यदि ऐसा संजोग लगातार कम से कम तीन दिन हो जाये तो वह तुरंत ही शराब छोड़ देंगे|
  • शराब छुड़ाने का एक उपाए यह भी है की आप किसी भी रविवार को एक शराब की उस ब्रांड की बोतल लायें जो ब्रांड आपके पति सेवन करते हैं|रविवार को उस बोतल को किसी भी भैरव मंदिर पर अर्पित करें तथा पुन: कुछ रूपए देकर मंदिर के पुजारी से वह बोतल वापिस घर ले आयें|जब आपके पति सो रहें हो अथवा शराब के नशे में चूर होकर मदहोश हों तो आप उस पूरी बोतल को अपने पति के ऊपर से उसारते हुए २१ बार "ॐ नमः भैरवाय"का जाप करें|उसारे के बाद उस बोतल को शाम को किसी भी पीपल के वृक्ष के नीचे छोड़ आयें|कुछ ही दिनों में आप चमत्कार देखेंगी|
  • कुत्ते का नाख़ून अथवा बिच्छु का डंक आप किसी भी बी हने से ताबीज में पति को धारण करवा दें|इसके प्रभाव से वो अन्य महिला का साथ छोड़ देंगे|
  • शराब छुडवाने का एक यह भी उपाय है की आप एक शराब की बोतल किसी शनिवार को पति के सो जाने के बाद उन पर से २१ बार वार लें|उस बोतल के साथ किसी अन्य बोतल में आठ सो ग्राम सरसों का तेल लेकर आपस में मिला लें और किसी बहते हुए पानी के किनारे में उल्टा गाढ़ दें जिससे बोतलों के ऊपर से जल बहता रहे|
  • आपको यदि शक हो की आपके पति के किसी अन्य महिला से सम्बन्ध हैं तो आप इसके लिए रात में थोडा कपूर अवश्य जलाया करें इससे यदि सम्बन्ध होंगे तो छूट जायेंगे|
  • रविवार की रात में सोते समय कुछ सिन्दूर बिस्तर पर पति के सोने वाले हिस्से की और बिखरा दें तथा प्रात: नहा कर माँ पार्वती का नाम लेकर उससे अपनी मांग भर लें|
  • जिस महिला से आपके पति का संपर्क है उसके नाम के अक्षर के बराबर मखाने लेकर प्रत्येक मखाने पर उसके नाम का अक्षर लिख दें|उस औरत से पति का छुटकारा पाने की ईशवर से प्रार्थना करते हुए उन सारे मखानो को जला दें तथा किसी भी प्रकार से उसकी काली भभूत को पति के पैर के नीचे आने की व्यवस्था करें|
  • किसी के पति यदि अधिक क्लेश करते हैं तो वह स्त्री सोमवार से यह उपाय आरम्भ करे |प्रथम सोमवार को अशोक वृक्ष के पास जाकर धुप-दीप से अर्चना कर अपनी समस्या का निवेदन कर जल अर्पित करें|सात पत्ते तोड़कर अपने घर के पूजास्थल में रख कर उनकी पूजा करें|अगले सोमवार को पुन:यह क्रिया दोहराएँ तथा सूखे पत्तों को मंदिर तथा बहते जल में प्रवाहित कर दें|
  • यदि पति पत्नी का आपस में बिना बात के झगड़ा होता है और झगडे का कोई कारण भी नही होता तो अपने शयनकक्ष में पति अपने तकिये के नीचे लाल सिन्दूर रखे व पत्नी अपने तकिये के नीचे कपूर रखे|प्रात: पति आधा सिन्दूर घर में ही कहीं गिरा दें और आधे से पत्नी की मांग भर दें तथा पत्नी कपूर जला दे|
  • पति-पत्नी के क्लेश के लिए पत्नी बुधवार को तीन घंटे का मोंन रखें|शुक्रवार को अपने हाथ से साबूदाने की खीर में मिश्री दाल कर खिलाएं तथा इतर दान करें व अपने कक्ष में भी रखें|इस प्रयोग से प्रेम में वृद्धि होती है|
  • कनेर के पुष्प को पानी मैं घिसकर अथवा तथा पीसकर उस से पति के माथे पर तिलक करें .यह भी अन्य महिला से सम्बन्ध समाप्त करने का अच्छा उपाय है .
  • जब आपको लगे की आपके पति किसी महिला के पास से आरहें हैं तो आप किसी भी बहाने से अपने पति का आंतरिक वस्त्र लेकर उसमे आग लगा दें और राख को किसी चौराहे पर फैंक कर पैरों से रगड़ कर वापिस आजाएं.
  • होली जलते समय तीन अभिमंत्रित गोमती चक्र लेकर उस महिला का नाम लेकर थोडा सिन्दूर लगाकर होली की अग्नि में फैंक दें|पति का उस महिला से पीछा छूट जायेगा|
  • किसी अन्य महिला के पीछे आपके पति यदि आपका अपमान करते हैं तो किसी भी गुरूवार को तीन सो ग्राम बेसन के लड्डू ,आटेके दो पेड़े,तीन केले व इतनी ही चने की गीली दाल लेकर किसी गाय को खिलाये जो अपने बछड़े को दूध पिला रही हो|उसे खिला कर यह निवेदन करें की हे माँ,मैंने आपके बच्चे को फल दिया आप मेरे बच्चे को फल देना|कुछ ही दिन में आपके पति रस्ते में आ जायेंगे|
  • गुरूवार को केले पर हल्दी लगाकर गुरु के १०८ नामों के उच्चारण से भी पति की मनोवृति बदलती है|
  • केले के वृक्ष के साथ यदि पीपल के वृक्ष की भी सेवा कर सकें तो फल और भी जल्दी प्राप्त होता है|
  • गृह क्लेश दूर करने के लिए तथा आर्थिक लाभ के लिए गेँहू शनिवार को पिसवाना चाहिए|उसमे प्रति दस किलो गेँहू पर सो ग्राम काले चने डालने चाहिए|
  • यदि किसी महिला अथवा किसी अन्य कारण से आपको लग रहा है की आपका परिवार टूट रहा है अथवा तलाक तक की हालत पैदा हो गयी हैं तो ऐसे परिस्थिति से बचाव के लिए किसी शिव मंदिर में श्रावण मास में आप किसी विद्वान ब्राह्मण से ग्यारह दिन तक लगातार 'रुद्राष्टध्यायी' जिसे म्हारुदरी यग भी कहते हैं ,से अभिषेक करवाएं|
  • यदि स्त्री को श्वेत प्रदर ,मासिक धर्म में अनियमितता अथवा इसके होने पर कमर दर्द हो तो वह पीपल की जटाको गुरूवार की दोपहर में काट कर छाया में सुखा लें|जब जटा अच्छी तरह से सुख जाये तो उसे पीस कर २०० ग्राम दही में १० ग्राम जटा का चूर्ण का नियमित सात दिन तक सेवन करे तथा रात में सोते समय त्रिफला चूर्ण भी सादा जल से ले|सात दिन में इस समस्या से मुक्ति मिल जाएगी |
  • यदि किसी स्त्री का समय से पहले अर्थात ४२ वर्षायु से पहले ही मासिक रुक जाये तो उस स्त्री को पुन:मासिक धर्म आरम्भ करने के लिए इन्द्रायन की जड़ का योनी पर धुआं देने से लाभ प्राप्त होता है|
  • यदि किसी स्त्री अथवा कन्या को मासिक से पहले पेट में बहुत दर्द होता है,तो उसे रात में सोते समय मूंज की रस्सी से पेट बाँध लें,प्रात: उस रस्सी को किसी चौराहे पर फैंक देने से लाभ होता है.
  • यदि किसी स्त्री को मासिक धर्म के समय कमर में दर्द हो तो वह मासिक आरम्भ होने से तीन दिन पहले पीपल की जड़ वह पीपल की सुखी शाखा को काले कपडे में लपेट कर अपने तकिये के नीच रख लें.
  • यदि किसी महिला को पेट मैं किसी कारण से अधिक दर्द रहता है तो वह मंगलवार से अपने सिरहाने किसी ताम्बे के लोटे में जल रखे और प्रति उठाने खाली पेट उस जल का सेवन करें .इस प्रकार से हर प्रकार के पेट दर्द का निवारण हो जायेगा .
  • प्रसूता के पेट पर यदि केसर का लेप किया जाये तो भी प्रसव आसानी से हो जाता है .
  • प्रसव काल से कुछ ही समय पहले यदि प्रसूता को १०० ग्राम गोमूत्र पिलाया जाये तो प्रसव आसानी से हो जाता है .
  • विवाहित महिला को अपने परिवार की सलामती के लिए ही माँ दुर्गा चालीसा के साथ माँ के १०८ नाम अथवा ३२ नाम की माला का जाप करना चाहिए .
  • कभी किसी महिला को दान करने की इच्छा हो तो दान सामग्री में लाल सिन्दूर के साथ इतर की शीशी ,चने की दाल तथा केसर अवश्य रखें .इस से सुहाग की आयु में वृद्धि होती है.

शादी में सात फेरे,सात वचन और सात कदम ही क्यों?हिन्दू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्म पूर्ण होती है सात फेरों के बाद सात वचन लिए जाते हैं। वर और कन्या द्वारा सातवचन लिए व दिए जाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारी संस्कृति में सात अंक का बहुत अधिक महत्व है। प्रात:काल मंगल दर्शन के लिए सात पदार्थ शुभ माने गए हैं। गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि इन सातों या इनमें से किसी एक का दर्शन अवश्य करना चाहिए। सात क्रियाएँ मानव जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।इसलिए इन्हें रोज जरूर करना चाहिए।शास्त्रों में माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि इन सातों को अभिवादन करना अनिवार्य बताया गया है। 

ईष्र्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार ये सात आंतरिक अशुद्धियाँ बताई गई हैं। अत: इनसे बचने के लिए सदैव बचे रहना चाहिए, क्योंकि इनके रहते बाह्यशुद्धि, पूजा-पाठ, मंत्र-जप, दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, ध्यान-योग तथा विद्या ज्ञान ये सातों निष्फल ही रहते हैं। अत: मानव जीवन में सात सदाचारों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। इनका पालन करने से ये सात विशिष्ट लाभ होते हैं - जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि होती हैं। नित्यकर्म पूजा प्रकाश में कहा गया है कि दैनिक जीवन में छोटी से छोटी अनेक ऐसी क्रियाएँ हैं जिनमें सात की संख्या का बहुत महत्व है।
इसीलिए ऐसा माना जाता है, क्योंकि वर्ष एवं महीनों को सात दिनों के सप्ताह में विभाजित किया गया है। सूर्य के रथ में सात घोड़े होते हैं जो सूर्य के प्रकाश से मिलनेवाले सात रंगों में प्रकट होते हैं। आकाश में इंद्र धनुष के समय वे सातों रंग स्पष्ट दिखाई देते हैं। दांपत्य जीवन में इंद्रधनुषी रंगों की सतरंगी छटा बिखरती रहे। इसीलिए शादी में सात फेरे, सात वचन व सात कदम लिए जाते हैं।

अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें।

दांपत्य सुख हेतु  यदि चाहते हुए वैवाहिक सुख नहीं मिल पा रहा है, हमेशा पति-पत्नि में किसी बात को लेकर अनबन रहती हो तो किसी भी शुक्रवार के दिन यह उपाय करें। मिट्टी का पात्र ले जिसमें सवा किलो मशरूम आ जाएं। मशरूम डालकर अपने सामने रख दें। पति-पत्नि दोनों ही महामृत्युंजय मंत्र की तीन माला जाप करें। तत्पश्चात इस पात्र को मां भगवती के श्री चरणों में चुपचाप रखकर आ जाए। ऐसा करने से मां भगवती की कृपा से आपका दांपत्य जीवन सदा सुखी रहेगा।




यदि आपके घर में रहने वाले सदस्यों में हमेशा अनबन रहती है, कोई सदस्य हमेशा बीमार रहता है। सारा पैसा बीमारी में चला जाता है या घर में पैसों की बरकत नही होती है और आपके घर में शांति नही है तो बिना पूजा पाठ एवं तंत्र मंत्र से आप गृह शांति कर सकते है। अगर आप राशि के अनुसार कुछ छोटे छोटे प्रयोग करें तो निश्चित ही आपके घर में शांति हो जाएगी।


मेष- मेष राशि वाले लोग अपनी राशि के अनुसार घर में लाल गाय का गौमूत्र छीटें और शाम को गुग्गल का धूप दें।


वृष- आपकी राशि का स्वामी शुक्र है इसलिए आपको लक्ष्मी जी के मन्दिर में गाय का घी दान देना चाहिए।


मिथुन- अगर आप बुध से संबंधीत वस्तुओं का दान दें तो आपके घर में निश्चित ही शांति रहेगी। आप किन्नरों को हरे वस्त्र के साथ हरी चुड़ीयां दान दें।


कर्क- आप पर चंद्रमा का विशेष प्रभाव है चंद्रमा के शुभ प्रभाव के लिए आप 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।


सिंह- आपकी राशि का स्वामी सूर्य है और आप पर सूर्य का विशेष प्रभाव है। इसलिए आप रोज सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से सूर्य को जल चढ़ाए।


कन्या- कन्या राशि वाले लोगों को गले हुए मूंग गाय को खिलाना चाहिए। इससे आपके धर में शांति बनी रहेगी।


तुला- आपकी राशि शुक्र की राशि है इसलिए आप नव विवाहित वधू को भोजन कराएं तो आप पर लक्ष्मी जी प्रसन्न होंगी और घर में बरकत बनी रहेगी।


वृश्चिक- आपकी राशि का स्वामी मंगल है इसलिए आप रोज रात को तांबे के बर्तन में पानी भर कर उसे अपने सिरहाने रख कर सोए और सुबह कांटेदार वृक्ष में डाल दें तो आपके घर में शांति रहेगी और सारी नकारात्मकता खत्म हो जाएगी।


धनु- धनु राशि वाले गुरु के उपाय करें यानी रोज पीली गाय को चारा दें और हर गुरुवार को किसी ब्राह्मण को भोजन कराए।


मकर- घर मे शांति बनाए रखने के लिए आप किसी जरूरतमंद व्यक्ति को काला कंबल दान दें।


कुंभ- आपकी राशि पर शनि देव का विशेष प्रभाव है इसलिए आप चिंटीयों को आटा और चिनी खिलाए।


मीन- अपनी राशि के अनुसार आपको रोज मछलियों को आटे की गोलियां खिलाना चाहिए या दाना डालना चाहिए।


यौनसुख अर्थात संभोग क्रिया के समय चरम सुख की प्राप्ति होना बहुत ही आनंददायक होता है। इसकी तुलना बहुत से विद्वानों ने स्वर्ग के सुख से की है। हर मनुष्य पूरे जीवन इस सुख को भोगना चाहता है। मनुष्य कभी भी काम अर्थात सेक्स से मुक्त नहीं होना चाहता। यही उसके जीवन का प्राथमिक बिंदु है। काम अर्थात सेक्स की शक्ति परमात्मा की शक्ति है इसलिए तो काम अर्थात सेक्स से शरीर में ऊर्जा पैदा होती है इसलिए मनुष्य को पूरी तरह से काम-शक्ति संपन्न होना चाहिए।

          लेकिन आज के आधुनिक युग में युवा पीढ़ी पर काम का बोझ, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़, मानसिक तनाव, विषाद, नशे की लत, पश्चिमी सभ्यता को अपनाने की लालसा, अप्राकृतिक मैथुन, एलोपैथिक दवाईयों के दुष्परिणाम, खान-पान में अनिमियता बरतना, दूषित वातावरण और बढ़ती हुई कामवासना के कारण उम्र से पहले ही यौनशक्ति की कमी से पीड़ित होते जा रहे हैं। कामशक्ति की कमी से ग्रस्त युवकों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है।

वाजीकरण क्या है-  सेक्स और वीर्य का आपस में बहुत ही गहरा संबंध है। हर युवक चाहता है कि स्त्री के साथ संभोग करते समय वीर्यस्खलन देर से हो। इसके लिए व्यक्ति हमेशा ही नई-नई चीजें ढूंढता रहता है। अपनी यौनशक्ति को बढ़ाने के लिए मनुष्य हर समय कोशिश करता रहता है इसके साथ ही वह अपनी संभोग शक्ति बढ़ाने के लिए भी प्रयत्नशील रहता है। पुरुष के मन में हमेशा यह इच्छा रहती है कि वह सदा जवान रहे और वह स्त्री के साथ पूरे जोश के साथ सेक्स करता रहूं। प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ता पुरुष भी हमेशा संभोगशक्ति बढ़ाने वाले उपाय तलाशता रहता है।

          बहुत से लोगों की यह धारणा बनी हुई है कि एक वीर्यवान पुरुष ही स्त्री को संभोग क्रिया के समय पूरी तरह से चरमसुख तक पहुंचा सकता है। संभोगशक्ति को बढ़ाने के लिए वीर्य को शुद्ध, गाढ़ा, और शुक्राणुओं की वृद्धि, स्तंभन शक्ति बढ़ाने के लिए आयुर्वेद के विद्वानों ने वाजीकरण नाम के अलग विभाग की रचना की है। उनके हिसाब से वीर्य को बढ़ाने के लिए, वीर्य से संबंधित दोषों को दूर करने के लिए, संभोग शक्ति और स्तंभन शक्ति बढ़ाने के लिए वाजीकरण औषधि का सेवन करना बहुत जरूरी है। वाजीकरण को वृष्य भी कहते हैं। इसलिए मनुष्य के शरीर में जिन खाद्य पदार्थों, यौगिक क्रियाओं या औषधियों के द्वारा शक्ति प्राप्त होती है उसे वाजीकरण के नाम से जाना जाता है।

वाजीकरण की जरूरत- दुनिया में हर स्त्री और पुरुष सेक्स के लिए बराबर रूप से समर्थ नहीं होते हैं और हर कोई संतान पैदा करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। जैसे कि बहुत से पुरुष शरीर से तो बहुत ही हष्ट-पुष्ट और ताकतवर होते हैं लेकिन फिर भी वह संभोगशक्ति में कमजोर होते हैं। इन्हीं के विपरीत बहुत से पुरुष दुबले-पतले शरीर वाले होते हुए भी बहुत तेज संभोग शक्ति वाले और स्त्री को संतुष्ट करने वाले होते हैं। बहुत से पुरुष स्वभाव से ही सेक्स करने में कमजोर होते हैं और इस क्रिया में कुछ ही देर में थक जाते हैं। लेकिन बहुत से पुरुष संभोग शक्ति को ज्यादा लंबे समय तक ले जाने वाले होते हैं। कुछ पुरुष वाजीकरण औषधियों के सेवन से संभोग क्रिया में सफल होते हैं तो कुछ इस क्रिया का बार-बार अभ्यास करने से इस क्रिया को सफल बनाते हैं। बहुत से पुरुष कम वीर्य वाले होते हैं तो कुछ संभोग क्रिया के समय देर से उत्तेजित होने वाले होते हैं। ऐसे पुरुषों में काम-उत्तेजना सोई हुई अवस्था में होती है जिसे स्त्री के नग्न शरीर के अंगों को देखकर, चुंबन, आलिंगन, सेक्स के बारे में बातचीत और नग्न तसवीर आदि के द्वारा जागृत किया जाता है। ऐसे पुरुषों को संभोग क्रिया में तुरंत उत्तेजित करने के लिए वाजीकरण औषधियों का सेवन कराना जरूरी होता है।

वाजीकरण का सेवन करने के लिए जरूरी बातें-

          आयुर्वेद में बताया गया है कि कम उम्र के बच्चों और ज्यादा उम्र के पुरुषों को वाजीकरण औषधि का सेवन नहीं करना चाहिए। इनका सेवन लगभग 16 से 50 साल तक की उम्र के लोगों को करना चाहिए। क्योंकि यही उम्र सेक्स करने के लिए सबसे ज्यादा अच्छा होता है। 16 साल से कम उम्र में या 50 साल से ज्यादा की उम्र में सेक्स करना बेकार होता है क्योंकि बाल्यकाल (युवावस्था से पहले की उम्र) में शरीर की धातुएं (वीर्य, शुक्राणु) पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं और अगर ऐसे में वह स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो वह उसके लिए व्यर्थ ही होता है और कभी-कभी हानिकारक भी हो जाता है।

          इसी तरह से 50 साल की उम्र अर्थात वृद्धावस्था में शरीर की सारी धातुएं (वीर्य, शुक्राणु) कमजोर हो जाती हैं। कमजोर शरीर वाला, कमजोर हड्डियों वाला व्यक्ति अगर किसी स्त्री के साथ संभोग करने में लग जाता है तो वह इसमें कुछ पाने के बजाय अपने शरीर का नाश करवा लेता है। रसायन औषधि के सेवन से जहां नए यौवन की प्राप्ति होती है वही वाजीकरण औषधियों के सेवन से यौनसुख मिलता है। जिस व्यक्ति का मन उसके वश में रहता है वह हमेशा वाजीकरण औषधि का सेवन कर सकता है।

वाजीकरण द्रव्य-

दूध-  आयुर्वेद के अनुसार दूध को सबसे ज्यादा उपयोगी वाजीकरण औषधि का नाम दिया गया है। दूध वीर्य की वृद्धि करने वाला, काम-शक्ति को बढ़ाने वाला और शरीर की खोई हुई ताकत को दुबारा पैदा करने में प्रभावशाली होता है। अगर स्त्री के साथ संभोग करने से पहले गर्म दूध पी लिया जाए तो इससे यौनशक्ति बढ़ती है, संभोग के प्रति मन में इच्छा पैदा होती है, पूरी मात्रा में वीर्य स्खलन होता है। वहीं अगर संभोग करने के बाद गर्म और मीठा दूध पीने से संभोग करने के समय खर्च हुई शक्ति दुबारा मिलकर व्यक्ति की थकान दूर हो जाती है। इसलिए संभोग करने के पहले और बाद में हमेशा दूध पीना चाहिए।

उड़द- उड़द के लड्डू, उड़द की दाल, दूध में बनाई हुई उड़द की खीर का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग शक्ति बढ़ती है।

अंडा-  अंडे के अंदर वीर्य को बढ़ाने की बहुत ज्यादा क्षमता होती है। दूध के अंदर अंडे की जर्दी मिलाकर पीने से वीर्य बढ़ता है और संभोग करने की शक्ति भी तेज होती है। वैसे तो ज्यादातर लोग मुर्गी और मोरनी के अंडों का सेवन करते ही हैं लेकिन इनके अलावा चिड़िया के अंडों को भी बहुत ज्यादा वाजीकरण औषधि के रूप में गिना जाता है।

तालमखाना- तालमखाना ज्यादातर धान के खेतों में पाया जाता है इसे लेटिन भाषा में एस्टरकैन्था-लोंगिफोलिया कहते हैं। वीर्य के पतले होने पर, शीघ्रपतन रोग में, स्वप्नदोष होने पर, शुक्राणुओं की कमी होने पर रोजाना सुबह और शाम लगभग 3-3 ग्राम तालमखाना के बीज दूध के साथ लेने से लाभ होता है। इससे वीर्य गाढ़ा हो जाता है।

गोखरू-  गोखरू का फल कांटेदार होता है और औषधि के रूप में काम आता है। बारिश के मौसम में यह हर जगह पर पाया जाता है। नपुंसकता रोग में गोखरू के लगभग 10 ग्राम बीजों के चूर्ण में इतने ही काले तिल मिलाकर 250 ग्राम दूध में डालकर आग पर पका लें। पकने पर इसके खीर की तरह गाढ़ा हो जाने पर इसमें 25 ग्राम मिश्री का चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए। इसका सेवन नियमित रूप से करने से नपुसंकता रोग में बहुत ही लाभ होता है।

इसके अलावा गोखरू का चूर्ण, आंवले का चूर्ण, नीम और गिलोय को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। इस बने हुए चूर्ण को रसायन चूर्ण कहा जाता है। इस चूर्ण को रोजाना 3 बार 1-1 चम्मच की मात्रा में दूध या ताजे पानी के साथ लेने से नपुंसकता, संभोग करने की इच्छा न करना, वीर्य की कमी होना, प्रमेह, प्रदर और मूत्रकृच्छ जैसे रोगों में लाभ होता है।

मूसली- मूसली पूरे भारत में पाई जाती है। यह सफेद और काली दो प्रकार की होती है। काली मूसली से ज्यादा गुणकारी सफेद मूसली होती है। यह वीर्य को गाढ़ा करने वाली होती है।

          मूसली के चूर्ण को लगभग 3-3 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ लेने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है और शरीर में काम-उत्तेजना की वृद्धि होती है।

          इसके अलावा मूसली के लगभग 10 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर अच्छी तरह से उबालकर किसी मिट्टी के बर्तन में रख दें। इस दूध में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और संभोग क्रिया की इच्छा न करना, वीर्य की कमी होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।

कौंच-  कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।

          कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम दूध के साथ लेने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और वीर्य की कमी होना जैसे रोग जल्दी दूर हो जाते हैं।

सेमल- सेमल के पेड़ पूरे भारतवर्ष में पाए जाते हैं। इसको लेटिन भाषा में सालमालिया-माला-बारिका कहा जाता है। सेमल के गोंद को मोचरस कहा जाता है। यौनरोग होने पर सेमल की गोंद और जड़ का प्रयोग होता था।

          लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सेमल की जड़ के चूर्ण और मूसली के चूर्ण को रोजाना सुबह और शाम मीठे दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होकर संभोग करने की शक्ति तेज होती है। स्वप्नदोष और शीघ्रपतन रोग से ग्रस्त रोगियों को सेमल की गोंद में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर लगभग 6-6 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम दूध और पानी के साथ सेवन करना चाहिए।

शतावरी- शतावरी को लेटिन भाषा में असपारगस-रेसेमेसस कहा जाता है। इसका पौधा उत्तर भारत में ज्यादा पाया जाता है। इसकी जड़ को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। शरीर में बल और वीर्य को बढ़ाने के लिए शतावरी की जड़ का चूर्ण लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम गर्म दूध के साथ लेना लाभकारी रहता है। इसे दूध में चाय की तरह पकाकर भी सेवन किया जा सकता है। यह औषधि स्त्रियों के स्तनों को बढ़ाने में लाभकारी रहती है। शतावरी के ताजे रस को 10 ग्राम की मात्रा में लेने से कुछ ही समय में वीर्य बढ़ता है।

विदारीकंद- विदारीकंद की बेल पूरे भारत में खासकर हिमालय की निचली पहाड़ियों, बंगाल, पंजाब, असम आदि स्थानों पर मिलती है। इसको लेटिन भाषा में Pueraria-Tuberosa कहा जाता है। विदारीकंद के चूर्ण को 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम असमान मात्रा के घी और शहद के साथ मिलाकर चाटने और ऊपर से गर्म दूध पीने से पुरुष की काम-शक्ति तेज हो जाती है। विदारीकंद बल और वीर्य बढ़ाने वाली औषधि है। इसके अलावा विदारीकंद के चूर्ण में इसी का ताजा रस मिलाकर लगभग 21 बार घोटें व डिब्बे में सुरक्षित रखें। इसमें से 5-5 ग्राम की मात्रा लेकर दिए गए तरीके से ही दूध के साथ सेवन करने से पुरुष का वीर्य बढ़ता है।

असगंध- असगंध को हिंदी भाषा में अश्वगंधा और लेटिन भाषा में Withania-Somnifera कहा जाता है। यह भारत में हर जगह पाई जाती है। राजस्थान के नागौर जिले में पाई जाने वाली असगंध, नागौरी असगंध के नाम से जानी जाती है। इसकी जड़ को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। अश्वगंधा का सेवन करने से शरीर में घोड़े की तरह संभोग करने की ताकत आ जाती है और इसके पौधे के अंदर से घोड़े की तरह गंध आती है इसलिए इसका नाम अश्वगंधा पड़ा है।

          अश्वगंधा की जड़ के 3-3 ग्राम चूर्ण को दूध के साथ सेवन करने से शारीरिक शक्ति और संभोग करने की शक्ति तेज होती है। वीर्य की कमी होना, धातु की कमजोरी, उत्तेजना की कमी होना, मानसिक कमजोरी आदि रोगों में अश्वगंधा का सेवन करना लाभकारी होता है। जब शरीर में वीर्य की कमी होने लग जाती है तो इसके कारण याददाश्त कम होने लगती है, किसी काम में मन नहीं लगता है, शरीर में हर समय थकान सी बनी रहती है, स्त्री के साथ संभोग करने का मन नहीं करता, लिंग पूरी तरह से उत्तेजित नहीं हो पाता। इस तरह के लक्षणों में अश्वगंधा के चूर्ण को गाय के घी में मिलाकर चाटने और उसके ऊपर से गाय का गर्म-गर्म दूध पीना लाभकारी रहता है।

कुछ आसान वाजीकरण (संभोग शक्ति बढ़ाने वाले) योग-

    * शतावरी, गोखरू, तालमखाना, कौंच के बीज, अतिबला और नागबला को एकसाथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तंभन शक्ति तेज होती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतला होना, यौन-दुर्बलता और विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत लाभकारी रहता है।
    * मोचरस, कौंच के बीज, शतावरी, तालमखाना को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर लगभग 400 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में भी संभोग क्रिया का पूरा मजा लिया जा सकता है। इस योग को लगभग 2-3 महीने तक सेवन करना लाभकारी रहता है।
    * लगभग 6 चम्मच अदरक का रस, 8 चम्मच सफेद प्याज का रस, 2 चम्मच देशी घी और 4 चम्मच शहद को एक साथ मिलाकर किसी साफ कांच के बर्तन में रख लें। इस योग को रोजाना 4 चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इसको लगातार 2 महीने तक सेवन करने से स्नायविक दुर्बलता, शिथिलता, लिंग का ढीलापन, कमजोरी आदि दूर हो जाते हैं।
    * बबूल की कच्ची पत्तियां, कच्ची फलियां और गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी डिब्बे आदि में रख लें। इस चूर्ण को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह योग शीघ्रपतन और स्वप्नदोष जैसै रोगों में बहुत लाभकारी रहता है।
    * सफेद मूसली के चूर्ण और मुलहठी के चूर्ण को बराबर की मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम शुद्ध घी के साथ मिलाकर चाट लें और ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस योग को नियमित सेवन करने से धातु वृद्धि होती है, नपुंसकता दूर होती है और शरीर पुष्ट और शक्तिशाली बनता है।
    * 10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना और बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंध, जायफल और रूदन्तीफल, 20-20 ग्राम सफेद मूसली, कौंच के बीज और त्रिफला तथा 15-15 ग्राम त्रिकटु, गोखरू को एक साथ जौकुट करके चूर्ण बना लें। इसके बाद इस मिश्रण के चूर्ण को लगभग 16 गुना पानी में मिलाकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी जल जाए तो इसमें 10 ग्राम भांगरे का रस मिलाकर दुबारा से उबाल लें। जब यह पानी गाढ़ा सा हो जाए तो इसे उतारकर ठंडा करके कपड़े से अच्छी तरह मसलकर छान लें और सुखाकर तथा पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसन्तकुसूमाकर रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग को मिला लें। इस औषधि को आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस औषधि को सेवन करने से पुरुषों के शरीर में बल और वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है और वह संभोगक्रिया को लंबे समय तक चला सकता है। इस औषधि के सेवन काल के दौरान खटाई, तेज मिर्च-मसाले वाले और तले हुए भोजन का सेवन करना चाहिए।
    * मुलहठी के बारीक चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा में घी और शहद से साथ चाटकर ऊपर से दूध पीने से संभोग शक्ति बहुत तेज होती है।
    * सर्दी के मौसम में उड़द की दाल के लड्ड़ू बनाकर रोजाना सुबह के समय खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
    * लगभग 20 ग्राम उड़द की दाल के छिलके उतारकर रात के समय पानी में भिगों दें। सुबह इस दाल को बारीक पीसकर पिट्ठी बना लें और कड़ाही में डालकर घी के साथ गुलाबी होने तक सेक लें। इसके बाद एक दूसरे बर्तन में 250 ग्राम दूध डालकर उबाल लें। दूध के उबलने पर इसमें सिंकी हुई उड़द की दाल डालकर पका लें। पकने पर इसमें शक्कर डालकर नीचे उतार लें। इस खीर को ठंडा करके रोजाना सुबह नाश्ते के समय 2 चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पुरुष की संभोग शक्ति बहुत ज्यादा तेज हो जाती है।
    * लगभग 250 ग्राम शतावरी घृत में इतनी ही मात्रा में शक्कर, 5 ग्राम छोटी पीपल और 5 चम्मच शहद मिला लें। इस मिश्रण को 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
    * कौंच के बीज, उड़द, गेंहू, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में दूध मिलाकर आटे की तरह गूंथ लें। इसके बाद इसकी छोटी-छोटी पूड़ियां बनाकर गाय के घी में तल लें। इन पूड़ियों को खाकर ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है। दिए गए द्रव्यों के देशी घी में लड़डू बनाकर सेवन करना भी बहुत लाभकारी रहता है।
    * जानकारी- उड़द की दाल और कौंच के बीजों को प्रयोग में लाने से पहले उन्हें गर्म पानी या दूध में उबालकर उनके छिलके उतार लेने चाहिए।
    * दही की मलाई में उतनी ही मात्रा में वंशलोचन, कालीमिर्च, शक्कर, शहद और काली मिर्च मिला लें। इसके बाद एक मिट्टी के घड़े के मुंह पर साफ कपड़ा बांध देना चाहिए तथा उस कपड़े से दिए गए मिश्रण को छान लें। इससे मिश्रण छनकर उस घड़े के अंदर जमा हो जाएगा। इस छने हुए मिश्रण को रोजाना 2-2 चम्मच की मात्रा में घी के साथ सेवन करके ऊपर से दूध पीने से पुरुष के शरीर में ताकत आती है और संभोग शक्ति तेज होती है।
    * 30 पीस छोटी पीपल को लगभग 40 ग्राम तिल के तेल या गाय के घी में भूनकर बिल्कुल पाउडर बना लें। फिर उसमें शहद और शक्कर मिलाकर दूध निकालने के बर्तन में डालकर उसी के अंदर गाय का दूध दूह लें। इस दूध को अपनी रुचि के अनुसार सेवन करें। इसको 1-1 चम्मच की मात्रा में गाय के ताजा निकले हुए दूध के साथ सेवन करने से बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
    * 100-100 ग्राम शतावरी, कौंच के बीज, उड़द, खजूर, मुनक्का दाख और सिंघाड़ा को मोटा-मोटा पीसकर चूर्ण बना लें। इसके बाद 1 लीटर दूध में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर इसमें चूर्ण को भी मिला लें और हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने पर जब सिर्फ दूध बच जाए तो नीचे उतारकर छान लें। फिर इसमें लगभग 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिला लें। इसके बाद इसमें शहद मिलाकर 50 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से बल और वीर्य बढ़ता है।
    * लगभग 25 ग्राम खस-खस के दाने, 25 ग्राम भुने चने, 25 ग्राम खांड और नारियल की पूरी गिरी को एक साथ कूटकर पीसकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना 70 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से शरीर में वीर्य और ताकत की बढ़ोत्तरी होती है।
    * लौंग, अकरकरा, कबाबचीनी, ऊदस्वालिस और बीजबंद को बराबर की मात्रा में लेकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के वजन से 2 गुणा पुराना गुड़ लेकर लेकर इसमें मिला लें और छोटी-छोटी गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ 21 दिनों तक लेने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।
    * 25 ग्राम पिसी-छनी हुई मुलहठी, 25 ग्राम पिसी और छनी असगंध, और 12 ग्राम पिसा और छना हुआ बिधारा को एकसाथ मिलाकर शीशी में भर लें। सर्दी के मौसम में इसमें से 3 ग्राम चूर्ण को अच्छी तरह से घुटे हुए लगभग 0.12 ग्राम मकरध्वज के साथ मिला लें। इसके बाद इसे मिश्री मिले दूध के साथ रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक सेवन करने से संभोग शक्ति तेज होती है।
    * लगभग 25-25 ग्राम सफेद बूरा, ढाक की छाल का रस, गेंहू का मैदा और शुद्ध घी को एकसाथ मिलाकर हलवा बना लें। इस हलुए को रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से शरीर मजबूत बनता है, धातु पुष्ट होती है और संभोग करते समय चरम सुख की प्राप्ति होती है।
    * 10 ग्राम भैंस का घी और 10 ग्राम सितोपलादि चूर्ण को किसी कांच या मिट्टी के बर्तन में भरकर रख लें। फिर उसी बर्तन में गाय या भैंस का दूह लें तथा उस दूध को पी लें। रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक इस दूध का सेवन करने से हर प्रकार की कमजोरी दूर हो जाती है, धातु पुष्ट हो जाता है, बल-वीर्य की बढ़ोतरी होती है, स्तंभन शक्ति बढ़ती है और संभोग शक्ति में रुचि उत्पन्न होती है।
    * सफेद चीनी, ग्वारपाठे का गूदा, घी और गेंहू के मैदा को बराबर मात्रा में एकसाथ मिलाकर हलवा बनाकर खाने से 21 दिन में ही पुरुष की नपुंसकता दूर हो जाती है।
    * 25-25 ग्राम केसर, पीपल, जायफल, जावित्री, अकरकरा, सोंठ, लोंग और लाल चंदन, 6 ग्राम शुद्ध हिंगुल, 6 ग्राम शुद्ध गंधक और 90 ग्राम अफीम को ले लें। इन सारी औषधियों को कूटकर और छानकर लगभग 20-20 ग्राम की मात्रा में रख लें। फिर सबको एकसाथ मिलाकर हिंगुल, गंधक और अफीम के साथ खरल में डालकर पानी मिलाकर घोट लें। इसके पूरी तरह से घुट जाने पर 0.36 ग्राम और 0.36 ग्राम की गोलियां बना लें। यह एक गोली रोजाना सोने से पहले खाकर ऊपर से दूध पीने से संभोग करने की शक्ति तेज होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है।
    * सूखे बिदारीकंद को पीसकर उसमें ताजी बिदारीकंद के रस की 7 भावनाएं देकर उसमें मिश्री तथा शहद मिलाकर लगभग 20 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से 3 महीने तक सुबह के समय सेवन करने से बूढ़े लोग भी अपने शरीर में जवानों जैसी ताकत महसूस करते हैं।
    * कुलंजन, सोंठ, मिश्री, अंजीर के बीज, गाजर के बीज, जरजीह के बीज और टिलयुन के बीजों को बराबर मात्रा में मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद शहद और सफेद प्याज के पत्तों के रस को एक साथ मिलाकर किसी कलईदार बर्तन में भरकर हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। जब प्याज का रस जल जाए और सिर्फ शहद ही बाकी रह जाए तो इसमें पहले बताई गई औषधियों का तैयार किया हुआ चूर्ण मिला लें। इस मिश्रण को अपनी ताकत के अनुसार सेवन करने से संभोग करने की शक्ति और संभोग करने में रुचि बढ़ती है।
    * लगभग 10-10 ग्राम जायफल, काला अनार, रुमी मस्तंगी, खस की जड़, बालछड़, दालचीनी, बबूल और शहद, 1 ग्राम कस्तूरी, 9 ग्राम सालममिश्री और 125 ग्राम मिश्री को एक साथ मिलाकर पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीने तक सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
    * सूखे आंवलों को अच्छी तरह से कूटकर और पीसकर छान लें। इस चूर्ण में ताजे आंवलों के ताजा रस को उबालकर और सुखाकर किसी कांच की शीशी में भर लें। इस मिश्रण में शहद और मिश्री मिलाकर अपनी ताकत के अनुसार 3 महीने तक खाने से बूढ़े लोगों के शरीर में भी जवानों के जैसी संभोग करने की ताकत आ जाती है।
    * तालमखाना, समुंद्रशोष, ढाक का गोंद, बीजबंद, बड़े गोखरू, तज और सफेद मूसली को एक साथ मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के बराबर ही इसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना सुबह 6 ग्राम की मात्रा में फांककर उसके ऊपर से गाय का धार वाला ताजा दूध पीने से शरीर में ताकत और वीर्य की बढ़ोतरी होती है।

लाभकारी शास्त्रीय वाजीकर योग-

पुष्पधंवा रस- इस योग का सेवन स्त्री और पुरुष दोनों ही के लिए लाभकारी रहता है और यह बहुत ही प्रसिद्ध योग है। इसकी 1-1 गोली सुबह और शाम पीसकर इसमें 1.5 चम्मच मक्खन और मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से स्त्री और पुरुष दोनों ही की संभोग करने की शक्ति और रुचि में वृद्धि होती है। इसके ऊपर से दूध में पिंड खजूर को उबालकर खाएं और दूध को पी लें। इसका सेवन करने से लगभग 10 दिनों के अंदर ही शरीर में काम-उत्तेजना जागृत होने लगती है।

          किसी स्त्री या पुरुष को किसी दुर्घटना या दिमागी चोट के कारण संभोग करने की इच्छा न करती हो तो इसका सेवन करने से उनकी संभोग करने में रुचि जागृत होने लगती है। इसके सेवन से लिंग की नसों में रक्त का संचार होने लगता है जिससे लिंग ज्यादा उत्तेजित होता है और संभोग शक्ति में चरम सुख प्राप्त होता है। जिन दंपतियों के घर में कोई संतान पैदा नहीं होती वह भी इसका सेवन करने से संतान प्राप्ति कर सकते हैं।

वानरी गुटिका- लगभग 150 ग्राम कौंच के बीजों को 2 लीटर दूध में डालकर उबाल लें। उबलने पर जब दूध गाढ़ा हो जाए तो इसे नीचे उतारकर ठंडा कर लें और बीजों के छिलके उतार लें। इसके बाद इन बीजों को बिल्कुल बारीक पीसकर रख लें। अब बीजों की पिट्ठी बनाकर इतनी ही मात्रा में मैदा मिलाकर एकसाथ गूंथ लें। फिर इसमें थोडा सा गिल्ट और मिल्कमेड का गुलाब जामुन पाउडर मिलाकर छोटे-छोटे आकार के गोले बनाकर गाय के घी में हल्का गुलाबी होने तक तलें। इन्हे एकतार की चाशनी में डालते जाएं। ठंडा होने के बाद इस चाशनी में ही शहद डालकर किसी कांच के बर्तन में सुरक्षित रख लें। इस 1-1 गुलाब जामुन को सुबह और शाम सेवन करने से पुरुष के शरीर में संभोग करने की शक्ति बहुत तेज हो जाती है।

संभोगशक्ति वढ़ाने वाले पकवान-

सिंघाड़े का हलवा- सबसे पहले लगभग 25 ग्राम सिंघाड़े का आटा, 25 ग्राम घी, 50 ग्राम चीनी और 250 ग्राम दूध ले लें। इसके बाद सिंघाड़े के आटे में घी डालकर हल्की आग पर लाल होने तक पकने के लिए रख दें। जब यह आटा अच्छी तरह से सिक जाए तो इसमें दूध डालकर पकाएं और हलुए की तरह सेक लें। जब यह गाढ़ा हो जाए तो इसमें चीनी डालकर चलाएं और तैयार होने के बाद नीचे उतार लें। इस हलुए को रोजाना सुबह नाश्ते में खाने और ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।

छुआरे का हलुवा- छुआरे का हलुवा बनाने के लिए 50 ग्राम छुआरे. 50 ग्राम घी, 300 ग्राम दूध, 50 ग्राम पिसी हुई मिश्री और 2 इलायची के पीस ले लें। इसके बाद छुआरों के बीजों को निकाल लें और बीज निकले हुए छुआरों को 250 ग्राम दूध में उबाल लें तथा बारीक पीस लें। इसके बाद कड़ाही में घी डालकर पिसे हुए छुआरों को इसमें डालकर भून लें। जब यह लाल हो जाए तो इसमें दूध डालकर पकाएं और गाढ़ा हो जाने पर इसमें पिसी हुई मिश्री मिला लें। अब इसमें इलायची के दानों का पाउडर मिलाकर अच्छी तरह से मिला लें। अब हलुआ तैयार है। इस हलुए को पाचन शक्ति के अनुसार 30 से 60 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह-सुबह खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की मात्रा बढ़ती है, संभोग शक्ति तेज होती है और शरीर मजबूत बनता है।

उड़द की खीर-  उड़द की दाल को घी में भूनकर उसमें दूध डालकर पकाएं। जब खीर तैयार हो जाए तो उसमें चीनी मिलाकर नीचे उतार लें। इस खीर को रोजाना सुबह नाश्ते के रूप में सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।

सफेद मूसली की खीर-  सफेद मूसली की खीर तैयार करने के लिए सबसे पहले 10 ग्राम सफेद मूसली का चूर्ण, 250 ग्राम गाय का दूध और 20 ग्राम पिसी हुई मिश्री लें लें। इसके बाद मूसली के चूर्ण को दूध में मिलाकर उबाल लें। उबलने पर जब यह गाढ़ा हो जाए तो इसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर नीचे उतार लें। इस मिश्रण को ठंडा करके नियमित रूप से सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, धातु की कमजोरी समाप्त होती है, नपुंसकता रोग में लाभ मिलता है और शीघ्रपतन रोग दूर होता है।

नारियल के लड्डू-  नारियल के लड्डू बनाने के लिए सबसे पहले 250 ग्राम कच्चे नारियल की कद्दूकस करी हुई गिरी, 50 ग्राम घी, 125 ग्राम मावा, 250 ग्राम चीनी और 10 छोटी इलायची को पीस लें। इसके बाद लगभग 25 ग्राम घी को कड़ाही में डालकर उसके अंदर नारियल की गिरी को मिलाकर भून लें। अब बचे हुए घी को मावे के साथ मिलाकर भून लें। इसके बाद दोनों भुनी हुई चीजों को आपस में मिला लें। अब इसके अंदर चीनी की चाशनी बनाकर मिला लें और इलायची का बारीक पिसा हुआ चूर्ण भी डाल लें। इस मिश्रण के 20-20 ग्राम के लड्ड़ू बनाकर 1-1 लड्ड़ू रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से धातु की कमी, कमजोरी, वीर्य की कमी होना आदि रोग दूर हो जाते हैं।

वाजीकरण औषधि का सेवन करते समय परहेज करने योग्य बातें-

          जिस तरह से आर्युवेद की किसी भी औषधि का सेवन करते समय क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए इस बात का खासतौर पर ध्यान रखा जाता है उसी तरह से वाजीकरण औषधि का प्रयोग करते समय भी व्यक्ति को कई तरह के परहेजों से गुजरना पड़ता है। इसके सेवन काल के दौरान व्यक्ति को जल्दी पचने वाला और पौष्टिक भोजन करना चाहिए। क्योंकि इस औषधि का सेवन करने के दौरान कब्ज का रोग बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए। भोजन में हरी सब्जियां. मौसमी फल, खिचड़ी, मोटे आटे की रोटी, दूध, सलाद, दलिया आदि का सेवन ज्यादा मात्रा में करना चाहिए। व्यक्ति को खटा

ई, खट्टे फल, तंबाकू, गुटखा, पान, शराब आदि का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। 

परिचय - कोई भी स्त्री या पुरुष जब दूसरे लिंग के प्रति आर्कषण महसूस करने लगता है तो उसी समय से सेक्स उनके लिए एक बहुत ही खास विषय बन जाता है। उनके मन में सेक्स के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है और शादी से पहले यह लोग सेक्स करने से भी पीछे नहीं हटते। सेक्स करने में जितना आनंद मिलता है उतनी ही उसके प्रति संवेदनशीलता बनी रहती है। इसी वजह से चाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों में ही सेक्स के प्रति हमेशा एक भूख सी रहती है वह ज्यादा से ज्यादा सेक्स का मजा लेना चाहता है।

            ऐसे बहुत से लोग हैं जो सेक्स का मजा लेना चाहते हैं लेकिन सेक्स करते समय वह कुछ ही देर में ठंडे हो जाते हैं। ऐसे मामलों में उनके मन में यह बात घर कर जाती है कि उन्हें शीघ्रपतन का रोग है। ऐसे लोग वैसे तो पूरी तरह से स्वस्थ होते हैं लेकिन दिमागी रूप से बीमार हो जाते हैं। उनके मन में यह विचार भी आने लगते हैं कि अगर मैं संभोगक्रिया के समय अपने पार्टनर को संतुष्ट नहीं कर पाता तो वह मुझसे नफरत करने लग सकता है या मुझे छोड़कर जा सकता है।

            यह एक ऐसी दिमागी समस्या है जिसके कारण आज लगभग हर वर्ग का व्यक्ति परेशान है। संभोगक्रिया के समय जब पुरुष का वीर्य निकल जाता है तभी उसकी संभोगक्रिया और संतुष्टि का चक्र पूरा हो गया मान लिया जाता है क्योंकि चरम आनंद के साथ ही वीर्य के निकलने का संबंध भी जुड़ा है लेकिन इसके बाद भी पुरुष की अंदर की प्यास नहीं बुझती। इसी वजह से वह अंदर ही अंदर शर्मिंदगी से घुटता रहता है।

            यह कोई रोग नहीं है इसमें अगर पुरुष सही तरह से और सही तरीके से संभोग करे तो वह इस क्रिया को इच्छा के अनुसार बढ़ा सकता है। इसके लिए उसे किसी तरह की दवा आदि न खाकर और उल्टे-सीधे नीम हकीमों के चक्कर में न पड़कर सिर्फ कुछ खास बातों की ओर ध्यान देने की जरुरत है।

संभोग करते समय जल्दबाजी न करें-

            संभोग करते समय किसी भी तरह की जल्दी करना या हड़बड़ाहट मचाना जल्दी वीर्यपात का कारण बनता है। किसी भी पति और पत्नी के बीच सेक्स संबंध सिर्फ खानापूर्ति के लिए या किसी भी काम को जल्दी से निपटाने के मकसद से नहीं होने चाहिए। ऐसे बहुत से व्यक्ति होते हैं जो संभोग करते समय तुरंत ही पूरे जोश में आ जाते हैं। उनकी उत्तेजना समय से पहले ही चरम सीमा तक पंहुच जाती है और जल्दी ही उनका वीर्यपात हो जाता है। कुछ समय में ही पुरुषों की ऐसी आदत से उनकी पत्नियां भी परेशान रहने लगती हैं क्योंकि उनको भी अपने पति की आदत से सेक्स में पूरी तरह से संतुष्टि नहीं मिल पाती है। इसलिए पुरुषों को संभोग करते समय किसी तरह की जल्दबाजी न करके धैर्यपूर्वक इस क्रिया को करनी चाहिए। इससे न सिर्फ पुरुष इस क्रिया को लंबा और संतुष्टि के साथ कर सकता है बल्कि स्त्री को पूरी तरह से यौन संतुष्टि मिलती है।

उत्तेजना पर ध्यान-

            पुरुष को अगर अपनी संभोगक्रिया को काफी देर तक करना  चाहता है तो उसे अपनी उत्तेजना का खासतौर पर ध्यान रखना जरूरी है। संभोगक्रिया के समय उत्तेजना का बढ़ना और काफी समय तक रहना पुरुष की शारीरिक क्रियाओं पर निर्भर करता है। जैसे ही महसूस हो कि शरीर में उत्तेजना बढ़ रही है, लिंग सख्त होता जा रहा है तो उसी समय अपनी शारीरिक क्रियाएं बंद कर देनी चाहिए, एकदम से शांत हो जाए। इससे बढ़ी हुई उत्तेजना सामान्य होने लगती है। अगर उत्तेजना ज्यादा बढ़ जाती है और शारीरिक आघात जारी रहते हैं तो वीर्य को निकलने से रोक पाना संभव नहीं हो पाता। इसलिए उत्तेजना को ज्यादा नहीं बढ़ने देना चाहिए।

वातावरण का ध्यान-

            संभोगक्रिया करते समय वातावरण का भी खासतौर पर ध्यान देना पड़ता है। संभोगक्रिया में पूरी तरह आनंद और संतुष्टि तब तक नहीं मिल पाती जब तक इस क्रिया को बिना किसी डर के और निश्चिंत होकर न किया जाए। शादी के बाद सोने के लिए पति और पत्नी के लिए अलग से कमरे की व्यवस्था कर दी जाती है फिर भी कई बार इस व्यवस्था में अचानक किसी तरह की रुकावट आ जाती है तो ऐसे में उन्हें सेक्स संबंध नहीं बनाने चाहिए। कई बार पति-पत्नी अपने कमरे में आकर संभोगक्रिया करने लगते हैं तभी उन्हें अगर कोई आवाज दे देता है तो उस समय उनकी सेक्स संबंधों के दौरान बनी मानसिकता को तेज आघात पहुंचता है और यही जल्दी वीर्यपात का कारण बनता है। अगर पति और पत्नी अपने कमरे में आते हैं तो उन्हें तुरंत ही संभोगक्रिया में नहीं लग जाना चाहिए। कमरे में आते ही सबसे पहले आपस में किसी भी टाँपिक को लेकर बातें आदि करने लग जाएं। जैसे ही लगे कि अब घर में सब लोग सो गए हैं तब संभोगक्रिया करने के लिए तैयार हो जाए। कमरे में हरे रंग या आसमानी रंग का बल्ब जलाकर संभोगक्रिया करने से आनंद मिलता है।

संभोगक्रिया के समय विभिन्न आसनों का प्रयोग हानिकारक है-

            संभोगक्रिया के समय बहुत से पुरुष अपनी बीवियों को सेक्स के अलग-अलग आसनों को प्रयोग करने की प्रयोगशाला बना देते हैं। पुरुष अक्सर किताबों या फिल्मों में सेक्स करने के अलग-अलग तरीकों को देखकर अपनी पत्नी के साथ भी उसी तरह सेक्स करने के लिए जोर डालते हैं। लेकिन सेक्स करने के यह तरीके या आसन जो दिखाए जाते हैं उनको करना लगभग नामुनकिन होता है। इन अलग-अलग आसनों को करते समय या संबंध बनाते समय पुरुष इस कदर उत्तेजित हो जाते हैं कि उसके लिए संबंध बनाए रखना मुश्किल हो जाता है जिसकी वजह से वे शीघ्र स्खलित हो जाते हैं। पत्नी को भी ऐसा महसूस होता है कि उसका पति तो उसे किसी खिलौने की तरह प्रयोग कर रहा है जिसके कारण वह शारीरिक और दिमागी रूप से पीड़ित रहने लगती है। वैसे भी सेक्स संबंधों का जितना आनंद सामान्य आसन से मिलता है उतना अलग-अलग आसनों का प्रयोग करने से नहीं मिलता। बहुत से विद्वानों का कहना है कि जो व्यक्ति सामान्य आसनों का प्रयोग करके सेक्स संबंधों का आनंद उठा रहा है उन्हें भूलकर भी अलग-अलग आसनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके लिए सबसे अच्छा आसन है कि संभोगक्रिया के समय पत्नी को नीचे और पति को उसके ऊपर लेटना चाहिए। इस आसन को करते समय पुरुष का लिंग बहुत ही आसानी के स्त्री की योनि में प्रवेश कर जाता है और पुरुष संभोग के समय स्त्री के चेहरे के भावों को पढ़ सकता है। विराम के समय स्त्री के शरीर पर निश्चल लेटने से एक अनोखा सुख प्राप्त होता है।

इसके बाद सिर्फ विपरीत रति वाले आसन को ही अच्छा माना गया है। इस आसन में पति नीचे लेटता है और पत्नी उसके ऊपर लेटती है। इसमें शरीर संचालन स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर कर सकते हैं। इस आसन में भी सारी स्थितियां पहले आसन के ही जैसी होती हैं लेकिन विराम के समय आराम का सुख स्त्री को ही मिलता है। इन दोनों आसनों की खासियत यह है कि इसमें जब तक संभोगक्रिया चलती है तब तक बिना किसी परेशानी के चलती है। दूसरे किसी आसन में यह सुविधा नजर नहीं आती है। बाकी सारे आसनों में जो कमी नजर आती है वह यह है कि उनमें संभोग और विराम काल में स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के सीने से लगकर आनंद नहीं उठा पाते। दूसरे आसनों में लिंग योनि में इतनी आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता जितनी आसानी से पहले वाले आसन में हो जाता है। कई बार लिंग को योनि में प्रवेश कराने से पुरुष की उत्तेजना इतनी बढ़ जाती है कि योनि में प्रवेश के साथ ही पुरुष का वीर्य निकल जाता है। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि जो व्यक्ति शीघ्रपतन रोग से ग्रस्त होता है उन्हें पहले वाले आसन में ही संभोग करना चाहिए।

संभोगक्रिया में अपने आप पर काबू रखें-

            सेक्स और संयम का आपस में बहुत ही गहरा संबंध है। बिना संयम के  संभोगक्रिया चल ही नहीं सकती। वैसे भी कहते है कि संयम ही सेक्स की धुरी है और संयम हर क्रिया में बहुत जरूरी है। युवा वर्ग के लिए संयम रखना बहुत जरूरी है। बहुत से व्यक्ति जब देखते हैं कि घर में कोई नहीं है तो वह तुरंत ही मौके का फायदा उठाकर अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाना चाहते हैं और तुरंत ही जल्दबाजी में संबंध लेते हैं। पत्नी भी इस चीज का विरोध नहीं कर पाती। इस प्रकार संबंध बनाते समय पुरुष की उत्तेजना शुरुआती दौर में ही चरम की स्थिति तक पंहुच जाती है। फिर किसी के आ जाने का डर उसे सबकुछ जल्दी-जल्दी करने पर मजबूर कर देती है। ऐसे समय में पुरुष का नाता संयम से बिल्कुल टूट जाता है और वीर्य जल्दी ही निकल जाता है। इसके अलावा और भी कई मौके आते हैं जब पति अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाने का मौका छोड़ना नहीं चाहता जिसके कारण व्यक्ति शीघ्र स्खलन का शिकार हो जाता है। इसलिए थोड़े से मजे के चक्कर में अपने आपको शीघ्र स्खलन का रोगी न बनने दें। अगर इस स्थिति को संभाला नहीं जाता तो संभोग के नाम पर पुरुष सिर्फ स्खलन की क्रिया ही पूरी करेगा। इसमें स्त्री को संतुष्टि सिर्फ नाम के लिए ही मिल पाती है। इसलिए सेक्स के समय संयम के महत्व को समझना बहुत जरूरी है।

सांसों को सयंमित रखें-

            संभोग करते समय सांसों की गति को सयंमित रखकर चरम की तरफ तेजी से बढ़ती हुई उत्तेजना को कम किया जा सकता है। उत्तेजना के बढ़ने पर जब आपको महसूस हो कि आपके न चाहते हुए भी आपका वीर्यपात होने को है तो उसी समय अपनी शारीरिक गतिविधियों को बंद कर देना चाहिए। शरीर को एकदम ढीला छोड़ दें और आंखे बंद करके लंबी सांस भरें। सांस को एकदम से बाहर नहीं छोड़ना चाहिए। जितना समय सांस को लेने में लगे उससे दुगने समय तक सांस को रोककर रखना चाहिए। सांस को छोड़कर फिर थोड़ी देर तक रुकना चाहिए। इसके बाद दुबारा जितनी लंबी सांस ले सकते हैं लें। सांस लेकर कुछ देर तक रुकें और फिर धीरे-धीरे सांस को छोड़े। 2-3 बार ऐसा करने से बढ़ी हुई उत्तेजना धीरे-धीरे कम होने लगती है। ऐसा करने में अगर व्यक्ति सफल हो जाता हो तो उसके सेक्स संबंधों के समय में बढ़ोत्तरी होती जाती है।

प्राक-क्रीड़ा को लंबा न खींचे-

            कुदरत ने स्त्री के शरीर को इस प्रकार का बनाया है कि उसे देखते ही पुरुष के शरीर में उत्तेजना बढ़ने लगती है। शादी से पहले अगर कोई व्यक्ति किसी लड़की से संबंध नहीं बनाता तो स्त्री के शरीर को छूने की और देखने की लालसा उसमें बढ़ती रहती है। ऐसा ही बिल्कुल स्त्री के साथ भी होता है। पुरुष स्त्री के शरीर को देखता है़ उसके अंगों को सहलाता है, आलिंगन करता है, उसके शरीर को चूमता है आदि। इसी के साथ वह चाहता है कि स्त्री भी उसके उसके शरीर के साथ वैसा ही करे जैसा वह करता है और वह स्त्री को ऐसा करने के लिए उकसाता है यही प्राक-क्रीड़ा होती है। इन सभी क्रियाओं में स्त्री इतनी ज्यादा उत्तेजित नहीं होती जितना कि पुरुष हो जाता है। स्त्री के शरीर से छेड़छाड़ करने से या अपने गुप्तांग को स्त्री के हाथों से छुआने से, संभोग करने से पहले ही पुरुष की उत्तेजना इतनी तेज हो जाती है कि वह स्त्री के साथ संभोग करने से पहले ही अनिंयत्रित उत्तेजना का शिकार होकर ठंडा पड़ जाता है जिसके कारण स्त्री भी अपनी संभोग करने की इच्छा को मन में ही दबाकर रह जाती है। इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि शारीरिक उत्तेजना को ज्यादा लंबा न खींचे। प्राक-क्रीड़ा संभोग करने की क्रिया को शुऱू करने का एक जरुरी हिस्सा है लेकिन इसी में ही अपनी ऊर्जा को खर्च नहीं कर देना चाहिए।

            इस बारे में एक बात ध्यान रखना और भी जरूरी है कि पुरुष को स्त्री से अपने गुप्तांग को उत्तेजित नहीं करना चाहिए क्योंकि संभोगक्रिया करने के लिए स्त्री को तैयार होने में थोड़ा समय लगता है जबकि पुरुष उससे जल्दी उत्तेजित हो जाता है। संभोगक्रिया में लिंग मुंड की बहुत ही खास भूमिका होती है। लिंग मुंड की त्वचा बहुत ही संवेदनशील होती है। स्त्री द्वारा इसे ज्यादा छूने से संभोग करने से पहले ही व्यक्ति की उत्तेजना चरम सीमा पर पंहुचने लगती है। जब संभोग किया जाता है तो पुरुष आगे बढ़ने के स्थान पर वहीं ढेर हो जाता है। जिन लोगों की उत्तेजना बहुत तेजी से भड़कती है उन्हें शारीरिक छेड़छाड़ से बचना चाहिए। अगर पुरुष इस बात का ध्यान रखें तो सेक्स संबंधों के दौरान मिलने वाले आनंद की सीमा को बढ़ाया जा सकता है।

            कुछ महान लोगों का मानना है कि जिस व्यक्ति की कामशक्ति कमजोर है उन्हें प्राक-क्रीड़ा से बचना चाहिए लेकिन ऐसा करने से स्त्री को सेक्स के लिए दिमागी रूप से तैयार होने में थोड़ी परेशानी महसूस हो सकती है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों को प्राक-क्रीड़ा के समय अपने सारे कपड़े नहीं उतारने चाहिए। कुछ समय तक स्त्री के शरीर के अंगों से छेड़छाड़ करके काम चलाया जा सकता है। जब संबंध बनाने हो तभी अपने आखिरी कपड़े को उतारना चाहिए और सेक्स में लीन हो जाना चाहिए। अगर शुरू में ही सारे कपड़े उतार दिये जाते हैं तो स्त्री के शरीर से लिंग आदि की रगड़ लगने से उसकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है जिसके कारण जल्द ही वीर्यपात हो जाता है। संभोग करते समय कमरे में ज्यादा रोशनी न करके हल्की रोशनी वाला बल्ब लगाना चाहिए।

संभोग के समय गंदी बातें न करें-

            संभोगक्रिया के समय काफी लोगों की आदत होती है कि वह इस दौरान अश्लील और उत्तेजना बढ़ाने वाली बातें करते हैं और अपनी पत्नी से भी चाहते हैं कि वह भी उसी प्रकार की बातें करें। इससे एक तो पुरुष को मजा आता है और साथ ही उसकी उत्तेजना भी बढ़ने लगती है। इससे संभोग करने से पहले ही वह इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि कुछ करने से पहले ही उनका वीर्यपात हो जाता है। इसलिए संभोग करने से पहले न तो खुद अश्लील बातें करें और न ही पत्नी को ऐसा करने के लिए उकसाएं।

            संभोगक्रिया के समय किसी भी प्रकार की उत्तेजना बढ़ाने वाली बातें करने के स्थान पर विराम के समय पत्नी से ऐसी बातें करें जिनका कि सेक्स से कोई संबंध न हो। ऐसा करने से एक तो बढ़ती हुई उत्तेजना कम होती है और दूसरा जल्दी वीर्यपात होने का डर नहीं रहता तथा दूसरी बातों के कारण स्त्री भी रुचि लेकर बातचीत में साथ देगी। ऐसी बातें करने से आत्मीयता बढ़ती है। अगर कोई व्यक्ति सेक्स संबंधों को ज्यादा नहीं खींच पाते तो कहीं न कहीं उसका कारण अश्लील और उत्तेजना बढ़ाने वाली बातचीत हो सकती है।

संभोगक्रिया के समय नशीले पदार्थों के सेवन से बचे-

            बहुत से लोग सोचते हैं कि अगर नशीले पदार्थों का सेवन करके सेक्स किया जाए तो यह क्रिया ज्यादा समय तक और आनंदमय हो जाती है। यही सोचकर वह इसे करने के लिए शराब, भांग, गांजा, अफीम या दूसरी किसी तेज चीज का सेवन करते हैं। लेकिन इससे बस थोड़ी देर के लिए ही उत्तेजना पैदा होती है और जितनी तेजी से पैदा होती है उतनी ही तेजी से खत्म हो जाती है। नशा करके सेक्स करने वालों की कामशक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है और उनकी ऊर्जा समय से पहले ही समाप्त हो जाती है। इसके अलावा नशा करके सेक्स करने वालों का बर्ताव भी जानवरों जैसा हो जाता है। उसमें अच्छा-बुरा पहचान करने की क्षमता खत्म हो जाती है और वह अपनी पत्नी को जानवरों की तरह नोचने लगता है। पत्नी अपने पति के इस व्यवहार से प्रताड़ित होकर संभोगक्रिया का आनंद लेने के बजाय अपने आपको पति से पीछा छुड़ाने के उपाय ढूंढती रहती है। इसलिए मन से ऐसे विचारों को तुरंत ही निकाल देना चाहिए कि नशा संभोग करने की शक्ति को बढ़ाता है।

तनावमुक्त रहे-

            आज के समय में हर इंसान किसी न किसी तनाव से घिरा हुआ है चाहे वह तनाव खाने से संबंधित हो, सोने से संबंधित हो, दिमाग से संबंधित हो या शरीर से संबंधित हो। यही तनाव व्यक्ति की सेक्स पाँवर पर भी असर डालता है। व्यक्ति का कोई भी काम तनाव की हालत में हो सकता है लेकिन संभोगक्रिया तनाव के साथ नहीं हो सकती। अगर किसी व्यक्ति को बहुत ज्यादा तनाव होता है तो उसका शारीरिक संबंधों की तरफ ध्यान ही नहीं होता। अगर वह किसी प्रकार से अपने आपको इन संबंधों के लिए तैयार कर लेता है तो उसका शरीर साथ नहीं देता, अगर जैसे-तैसे शरीर को तैयार कर लिया जाता है तो जल्दी वीर्यपात हो जाने के कारण संभोगक्रिया का पूरा मजा खराब हो जाता है। इस समस्या से आज के समय में बहुत से युवक ग्रस्त हैं वह खुद मानते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण तनाव होता है। तनाव उनकी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन गया है कि बाहर निकलने का नाम ही नहीं लेता।

चिकित्सा-

    * एक लौंग को चबाकर उसकी लार को लिंग के पिछले भाग पर लगाने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
    * लगभग 10-10 ग्राम सफेद प्याज का रस और शहद, 2 अंडे की जर्दी और 25 मिलीलीटर शराब को एक साथ मिलाकर रोजाना शाम के समय लेने से संभोगशक्ति बढ़ जाती है।
    * लगभग 5 बादाम की गिरी, 7 कालीमिर्च और 2 ग्राम पिसी हुई सोंठ तथा जरूरत के अनुसार मिश्री को एक साथ मिलाकर पीस लें और फंकी लें। इसके ऊपर से दूध पी लें। इस क्रिया को कुछ दिनों तक नियमित रूप से करने से संभोगक्रिया के समय जल्दी वीर्य निकलने की समस्या दूर हो जाती है।
    * उड़द की दाल को पानी में पीसकर पिट्ठी बनाकर कढ़ाई में लाल होने तक भून लें। इसके बाद गर्म दूध में इस पिसी हुई दाल को डालकर खीर बना लें। अब इसमें मिश्री मिलाकर किसी कांसे या चांदी की थाली में परोसकर सेवन करने से संभोग करने की शक्ति बढ़ जाती है। इस खीर को लगभग 40 दिनों तक प्रयोग करने से लाभ होता है।

वीर्य को बढ़ाना-

    * इमली के बीजों को पानी में छिलका उतरने तक भिगो लें। इसके बाद इन बीजों का छिलका उतारकर चूर्ण बना लें। इसके लगभग आधा किलो चूर्ण में इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर रख लें। इसमें से लगभग 2 ग्राम चूर्ण को लगभग 40 दिनों तक नियमित रूप से फांकने के बाद ऊपर से दूध पीने से वीर्य गाढ़ा होता है और शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है।
    * बरगद के पके हुए फलों को छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें और इसमें मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को 5 ग्राम की मात्रा में रोजाना शाम को दूध के साथ लेने से एक सप्ताह के बाद ही वीर्य गाढ़ा होना शुरू हो जाता है। इस चूर्ण को लगभग 40 दिनों तक सेवन किया जा सकता है।
    * लगभग आधा किलो देशी फूल की कच्ची कलियों को डेढ़ लीटर पानी में डालकर उबाल लें। पानी उबलने के बाद जल जाने पर इस मिश्रण को बारीक पीसकर 5-5 ग्राम की गोलियां बनाकर एक कांच के बर्तन में रखकर ऊपर से ढक्कन लगा दें। इसमें से 1 गोली को रोजाना सुबह के समय दूध के साथ लेने से संभोग करने की शक्ति बढ़ती है और वीर्य भी मजबूत होता है।
    * लगभग 10 ग्राम बिदारीकंद के चूर्ण को गूलर के रस में मिलाकर चाट लें। इसके ऊपर से घी मिला हुआ दूध पीने से जो व्यक्ति संभोग क्रिया में पूरी तरह से सक्षम नहीं होते उनके शरीर में भी यौन शक्ति का संचार होने लगता है।
    * देशी फूल की तुरंत उगी अर्थात नई कोंपलों को सुखाकर और पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को रोजाना 6 ग्राम की मात्रा में फांककर ऊपर से मिश्री मिला हुआ दूध पीने से वीर्य पुष्ट होता है। इसके अलावा इसका सेवन करने से पेशाब के साथ वीर्य का आना और स्वप्नदोष जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।
    * चिरौंजी, मुलहठी और दूधिया बिदारीकंद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को लगभग 1 सप्ताह तक लेने से और ऊपर से दूध पीने से वीर्य के सारे दोष दूर होते हैं और वीर्य बढ़ जाता है।
    * सोंठ, सतावर, गोरखमुंडी, थोड़ी सी हींग और देशी खांड को एक साथ मिलाकर सेवन करने से लिंग मजबूत और सख्त होता है और बुढ़ापे तक ऐसा ही रहता है। इसके अलावा इसको  लेने से वीर्य बढ़ता है और शीघ्रपतन जैसे रोग दूर हो जाते हैं। इस चूर्ण का सेवन करते समय गुड़ और खट्टे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
    * सिंघाड़े के आटे का हलुआ, उड़द और चने की दाल का हलुआ, अंडों की जर्दी का गाय के घी में तैयार किया हुआ हलुआ, मेथी और उड़द की दाल के लडडू, आंवले की चटनी, गेहूं, चावल, बराबर मात्रा में जौ और उड़द का आटा और उसमें थोड़ी सी पीपल को डालकर तैयार की गई पूडि़यां और नारियल की खीर आदि का सेवन करने से हर तरह के धातु रोग नष्ट हो जाते हैं, वीर्य पुष्ट होता है और संभोग करने की शक्ति बढ़ती है।

लिंग को मजबूत करना-

    * सुअर की चर्बी और शहद को बराबर मात्रा में एक साथ मिलाकर लिंग पर लेप करने से लिंग में मजबूती आती है।
    * हींग को देशी घी में मिलाकर लिंग पर लगा लें और ऊपर से सूती कपड़ा बांध दें। इससे कुछ ही दिनों में लिंग मजबूत हो जाता है।
    * भुने हुए सुहागे को शहद के साथ पीसकर लिंग पर लेप करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है।
    * जायफल को भैंस के दूध में पीसकर लिंग पर लेप करने के बाद ऊपर से पान का पत्ता बांधकर सो जाएं। सुबह इस पत्ते को खोलकर लिंग को गर्म पानी से धो लें। इस क्रिया को लगभग 3 सप्ताह करने से लिंग पुष्ट हो जाता है।
    * शहद को बेलपत्र के रस में मिलाकर लेप करने से हस्तमैथुन के कारण होने वाले विकार दूर हो जाते हैं और लिंग मजबूत हो जाता है।
    * रीठे की छाल और अकरकरा को बराबर मात्रा में लेकर शराब में मिलाकर खरल कर लें। इसके बाद लिंग के आगे के भाग को छोड़कर लेप करके ऊपर से ताजा साबुत पान का पत्ता बांधकर कच्चे धागे से बांध दें। इस क्रिया को नियमित रूप से करने से लिंग मजबूत हो जाता है।
    * बकरी के घी को लिंग पर लगाने से लिंग मजबूत होता है और उसमें उत्तेजना आती है।
    * बेल के ताजे पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर लगाने से लिंग में ताकत पैदा हो जाती है।
    * धतूरा, कपूर, शहद और पारे को बराबर मात्रा में मिलाकर और बारीक पीसकर इसके लेप को लिंग के आगे के भाग (सुपारी) को छोड़कर बाकी भाग पर लेप करने से संभोग शक्ति तेज हो जाती है।
    * असगंध, मक्खन और बड़ी भटकटैया के पके हुए फल और ढाक के पत्ते का रस, इनमें से किसी भी एक चीज का प्रयोग लिंग पर करने से लिंग मजबूत और शक्तिशाली बनता है।
    * पालथ लंगी का तेल, सांडे का तेल़, वीर बहूटी का तेल, मोर की चर्बी, रीछ की चर्बी, दालचीनी का तेल़, आधा भाग लौंग का तेल, 4 भाग मछली का तेल को एकसाथ मिलाकर कांच के चौड़े मुंह में भरकर रख लें। इसमें से 8 से 10 बूंदों को लिंग पर लगाकर ऊपर से पान के पत्ते को गर्म करके बांध लें। इस क्रिया को लगातार 1 महीने तक करने से लिंग का ढीलापन समाप्त हो जाता है़, लिंग मजबूत बनता है। इस क्रिया के दौरान लिंग को ठंडे पानी से बचाना चाहिए।

जानकारी-

     लिंग की मालिश या लेप करते समय एक बात का ध्यान रखें कि लिंग के मुंह के नीचे सफेद रंग का बदबूदार मैल जमा हो जाता है। इस मैल को समय-समय ठंडे पानी से धोकर साफ करते रहने चाहिए।

कामशक्ति बढ़ाने वाली मलहम-

    * हीरा हींग को शुद्ध शहद में मिलाकर लिंग पर लेप करने से शीघ्रपतन का रोग जल्दी दूर हो जाता है। लिंग पर इस मलहम अर्थात लेप को लगाने के बाद शीघ्रपतन से ग्रस्त रोगी अपनी मर्जी से स्त्री के साथ संभोग करने का समय बढ़ा सकता है।
    * 10 ग्राम दालचीनी का तेल और 30 ग्राम जैतून के तेल को एक साथ मिलाकर लिंग पर लेप करते रहने से शीघ्रपतन की शिकायत दूर हो जाती है, संभोग करने की शक्ति बढ़ती है। इस क्रिया के दौरान लिंग को ठंडे पानी से बचाना चाहिए।
    * काले धतूरे की पत्तियों के रस को टखनों पर लगाकर सूखने के बाद संभोग करने से संभोगक्रिया पूरी तरह से और संतुष्टि के साथ संपन्न होती है। 


ईश्वर हर जगह नहीं हो सकता, इसलिए उसने मां बनाई... यह कहावत जितनी सच है, उतना ही बड़ा सच यह भी है कि किसी महिला को मां के दर्जे तक पहुंचाने वाले नौ महीने बेशकीमती होते हैं। इन नौ महीनों में वह क्या सोचती है, क्या खाती है, क्या करती है, क्या पढ़ती है, ये तमाम चीजें मिलकर आनेवाले बच्चे की सेहत और पर्सनैलिटी तय करती हैं। इन नौ महीनों को अच्छी तरह प्लान करके कैसे मां एक सेहतमंद जिंदगी को जीवन दे सकती है!

मां बनने की सही उम्र 

मां बनने के लिए 20-30 साल की उम्र सबसे सही होती है, लेकिन आजकल बड़ी संख्या में महिलाएं करियर की वजह से 32-33 साल की उम्र में मां बनना पसंद कर रही हैं। उन्हें अपना ज्यादा ध्यान रखना चाहिए। शुरू से ही किसी अच्छी गाइनिकॉलजिस्ट की देखरेख में रहें। 35 साल के बाद बच्चा प्लान करने से मां और बच्चा, दोनों को दिक्कतें आ सकती हैं। उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में मेडिकल प्रॉब्लम जैसे कि हाइपरटेंशन, ब्लडप्रेशर, डायबीटीज आदि की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में गर्भधारण करने में परेशानी आने के अलावा बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है। बच्चे में डाउंस सिंड्रोम (मंगोल बेबी) हो सकता है, यानी बच्चे का मानसिक विकास गड़बड़ाने का खतरा होता है। डिलिवरी के वक्त भी मुश्किल हो सकती है। 

पहले से रहें तैयार 

अगर आप बच्चा प्लान कर रही हैं तो कम-से-कम तीन-चार महीने पहले से शारीरिक और मानसिक तौर पर खुद को तैयार करना शुरू कर दें। उसी के मुताबिक खानपान का ध्यान रखें, भरपूर नींद लें और स्ट्रेस लेवल कम रखें। कोशिश करें कि सामान्य से वजन न बहुत ज्यादा हो, न बहुत कम। प्राणायाम और योगासन करें। इससे तन और मन, दोनों शांत रहेंगे और गर्भधारण में आसानी होगी। 

प्री-कंसेप्शनल काउंसलिंग: गर्भधारण करने से पहले काउंसलिंग (प्री-कंसेप्शनल काउंसलिंग) कराना अच्छा रहता है। इसके लिए पति-पत्नी दोनों को डॉक्टर के पास जाना चाहिए। काउंसलिंग के अलावा डॉक्टर पति-पत्नी के कुछ टेस्ट भी करवाते हैं, जैसे कि ब्लड टेस्ट, शुगर टेस्ट, हीमोग्लोबिन टेस्ट आदि। अगर माता-पिता को कोई बीमारी है तो इन टेस्ट में उसकी जानकारी मिल जाती है। मसलन, अगर पति आरएच (Rh+) पॉजिटिव और पत्नी आरएच नेगेटिव (Rh-) हो और दूसरा बच्चा प्लान कर रहे हों (पहले बच्चे को कोई दिक्कत नहीं होगी) तो बच्चे को एनीमिया, पीलिया या हाइड्रॉप्स फिटालिस (बच्चे का शरीर सूजा और पानी भरा) हो सकता है। पहले से जानकारी मिलने पर इंजेक्शन लगाकर बच्चे को बीमारी से बचाया जा सकता है। पहले बच्चे को इस तरह की बीमारी अनीमिया, हाइपोथायरॉडिज्म, कैलशियम की कमी जैसी समस्याओं के अलावा फैमिली में किसी बीमारी की हिस्ट्री रही है तो पहले से जानकारी मिलने पर इलाज आसान होता है। थैलसीमिया से पीड़ित होने पर अबॉर्शन कराना ही बेहतर रहता है। अगर बच्चे के लिए पहले से तैयार हैं तो उसके अचानक आ जाने का तनाव भी नहीं होगा। 

बच्चे की सेहत के लिए सबसे जरूरी क्या है, आगे जानें... 


सेहतमंद मां यानी सेहतमंद बच्चा 

होनेवाली मां का वजन और सेहत अगर ठीक है तो बच्चा भी सेहतमंद होगा। मां में हीमोग्लोबिन कम नहीं होना चाहिए और बीएमआई 18.5 से कम नहीं होना चाहिए। अगर मां कमजोर होगी तो प्रेग्नेंसी के दौरान 20 किलो तक वजन बढ़ाना पड़ेगा। वैसे, प्रेग्नेंसी के दौरान 12-13 किलो वजन बढ़ना सामान्य माना जाता है। इसमें से बच्चे का वजन तीन-साढ़े तीन किलो तक ही होता है। बाकी कैलरी मां डिलिवरी और दूसरी जरूरत के वक्त के लिए रिजर्व रखती है। दूध पिलाने के लिए भी प्रेग्नेंसी के दौरान ही मां कैलरी रिजर्व करती है। अगर मां का वजन ज्यादा है तो उसे प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा वजन बढ़ाने से बचना चाहिए। वैसे प्रेग्नेंसी के शुरू के कुछ महीनों में बच्चे की ग्रोथ कम ही रहती है, जबकि बाद के महीनों में बच्चा तेजी से बढ़ता है। उस वक्त मां को ज्यादा कैलरी की जरूरत पड़ती है, इसलिए दूसरे और तीसरे ट्राइमेस्टर में खाने पर ज्यादा ध्यान दें। 

आ सकती हैं ये दिक्कतें : 

प्रेग्नेंसी को तीन ट्राइमेस्टर में बांटा जाता है : 

1. 0-3 महीने: शुरू के तीन महीने काफी अहम होते हैं क्योंकि इस दौरान मां के शरीर में काफी बदलाव होते हैं। शरीर इन बदलाव और बच्चे के साथ एडजस्ट कर रहा होता है। हार्मोंस के साथ-साथ ब्रेस्ट, खाने के टेस्ट और स्किन में भी बदलाव आने लगते हैं। उसका मूड काफी तेजी से बनने-बिगड़ने लगता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस वक्त पति को खासतौर पर पेशंस रखना चाहिए और पत्नी को सहारा देना चाहिए। इस वक्त अबॉर्शन की आशंका भी ज्यादा होती है। ज्यादा भीड़ या रेडिएशन वाली जगह पर जाने से बचें। इन तीन महीनों में बच्चे के अंग बनते हैं। ऐसे में खाने की मात्रा से ज्यादा उसकी क्वॉलिटी पर ध्यान देना चाहिए। मॉर्निंग सिकनेस, मितली और उलटी की शिकायत भी सबसे ज्यादा इसी वक्त होती है। इस वजह से आमतौर पर महिला का वजन कम हो जाता है, इसलिए घबराएं नहीं। ऐसे में महिला को हर वह चीज खाने की सलाह दी जाती है, जो उसे पसंद आए। 

मॉर्निंग सिकनेस से बचने के लिए नीबू पानी या अदरक की चाय पी सकती हैं। दिन भर में चार या पांच बार तरल चीजें लें, जैसे कि छाछ, लैमोनिड, नीबू पानी, नारियल पानी, जूस व शेक आदि। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होगी। 

2. 3-6 महीने: आमतौर पर प्रेग्नेंसी के सबसे आसान महीने होते हैं। इस वक्त तक महिला का शरीर बदलावों के साथ एडजस्ट कर चुका होता है। स्किन ग्लो करने लगती है। फिजिकल एक्टिविटी बढ़ा सकती हैं। इस वक्त हेल्दी डाइट पर फोकस करना चाहिए। 

3. 6-9 महीने: बच्चे का शरीर तेजी से बढ़ने लगता है, इसलिए कैलरी ज्यादा लेनी चाहिए। इन तीन महीनों में खाने पर काफी ध्यान देना चाहिए। पेट काफी बढ़ जाता है, इसलिए सांस लेने में दिक्कत महसूस हो सकती है। पैरों में सूजन और कमजोरी आ सकती है। ज्यादा देर तक पैर लटकाकर न बैठें। किसी भी तेल से नीचे से ऊपर की ओर पैरों की मालिश कर सकती हैं। अगर लेटने के बाद भी सूजन बनी रहती है तो डॉक्टर को दिखाएं। कई बार स्किन में सूखापन आने लगता है और ईचिंग बढ़ जाती है। इससे बचाव के लिए साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें और अच्छी क्रीम लगाएं। स्ट्रेच मार्क्स पड़ने लगें तो नारियल तेल लगाना चाहिए। फिजिकल एक्टिविटी बहुत ज्यादा न रखें, ब्लीडिंग हो सकती है। 

मां के लिए कौन कौन से टेस्ट जरूरी हैं...जानें आगे 
कौन-कौन से टेस्ट जरूरी 

अगर पहले से गायनिकॉलजिस्ट से कंसल्ट नहीं कर रहे हैं तो प्रेग्नेंसी पता चलते ही किसी अच्छे गाइनिकॉलजिस्ट के पास रजिस्ट्रेशन कराएं। मां बननेवाली महिला की सेहत के मुताबिक डॉक्टर टेस्ट कराते हैं, फिर भी हीमोग्लोबिन, कैलशियम, ब्लड शुगर, यूरिन और एचआईवी टेस्ट जरूर कराना चाहिए। ये हर तीन महीनों में कराए जाते हैं। 

- कोई परेशानी नहीं हो तो अल्ट्रासाउंड आमतौर पर तीन बार कराया जाता है। दूसरे महीने में बच्चे की धड़कन जानने के लिए, चौथे महीने में बच्चे का विकास देखने के लिए और आखिरी महीने में बच्चे की स्थिति देखकर डिलिवरी प्लान करने के लिए। अगर डॉक्टर को जरूरी लगता है, तो वह बीच में भी अल्ट्रासाउंड करा सकता है। 

- मिर्गी, हाइपोथायरॉइड और थैलसीमिया के लिए भी जांच कराई जाती है। अगर पैरंट्स में थैलसीमिया के लक्षण होते हैं तो बच्चे के इससे पीड़ित होने की आशंका 25 फीसदी बढ़ जाती है। जांच में अगर बच्चा इन्फेक्टिड पाया जाता है तो उसे अबॉर्ट करना ही बेहतर होता है। 

- चौथे और पांचवें या पांचवें और छठे महीने में मां को टिटनेस का टीका लगाया जाता है। 

- शुरू के तीन महीने में मंथली चेकअप काफी होता है। कोई परेशानी होने पर 15 दिनों में भी जांच की जाती है। बच्चे के 28 हफ्ते का होने पर दो हफ्ते में एक बार चेकअप जरूरी होता है। 

- सोनोग्राफी खुद न कराएं। जब डॉक्टर बताए, तभी सोनोग्राफी कराएं। हालांकि इससे बच्चे को कोई नुकसान नहीं होता है लेकिन इस दौरान एक्स-रे से जरूर बचना चाहिए क्योंकि ये किरणें बच्चे को नुकसान पहुंचा सकती हैं। 

डाइट का रखें खास ख्याल 

मां और बच्चे, दोनों की सेहत काफी हद तक डाइट पर डिपेंड करती है। ऐसे में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन से भरपूर चीजें ज्यादा खानी चाहिए जैसे कि दालें, पनीर, अंडा, नॉनवेज, सोयाबीन, दूध, पनीर, दही, पालक, गुड़, अनार, चना, पोहा, मुरमुरा आदि। फल और हरी पत्तेदार सब्जियां खूब खाएं। शरीर में पानी की कमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए क्योंकि डिलिवरी के वक्त काफी खून की जरूरत पड़ती है और बच्चा भी फ्लूइड में रहता है, इसलिए नीबू पानी, नारियल पानी, छाछ, जूस खूब पिएं। बच्चे के दिमाग के विकास के लिए ओमेगा-3 और ओमेगा-6 बहुत जरूरी हैं। फिश लिवर ऑयल, ड्राइफ्रूट्स, हरी पत्तेदार सब्जियों और सरसों के तेल में ये अच्छी मात्रा में मिलते हैं। 
-बच्चे को वही मिलता है, जो मां खाती है इसलिए देर तक भूखी न रहें। खाने में ज्यादा अंतर से एसिडिटी हो जाती है। बेबी का साइज बढ़ने के साथ स्टमक की कैपिसिटी कम हो जाती है, इसलिए थोड़ा-थोड़ा खाएं लेकिन बार-बार खाएं। दिन में पांच बार खाना, तीन बार फ्रूट्स और दो बार दूध जरूर पिएं। 

-प्रेग्नेंसी के दौरान किसी खास चीज को खाने का दिल ज्यादा करने लगता है। ऐसे में किसी एक ही चीज को खाने के बजाय बाकी चीजों को भी खाने में शामिल करें और वैरायटी का ध्यान रखें। 

-तला और मसालेदार न खाएं। इनसे गैस, एसिडिटी, जलन हो सकती है। जो भी खाएं, फ्रेश खाएं। बाहर के खाने से इंफेक्शन का खतरा होता है। 

-मदर हॉर्लिक्स र बॉर्नविटा आदि भी ले सकते हैं। 

मां के लिए योग और व्यायाम भी जरूरी है, क्यों...जानें आगे 

एक्सरसाइज और योग 

गर्भधारण से पहले : बच्चा प्लान करने के साथ ही योग और प्राणायाम शुरू कर देना चाहिए। गर्भधारण करने से तीन-चार महीने पहले ही कपालभाति क्रिया, अग्निसार क्रिया, उर्ध्वहस्तोतान आसन, उत्तानपाद आसन, सेतुबंध आसन, पवनमुक्त आसन, भुजंगासन, नौकासन, मंडूकासन और अनुलोम-विलोम व भस्त्निका प्राणायाम शुरू कर दें। इससे गर्भधारण करने में आसानी होगी और शरीर के अंदरूनी हिस्सों को ताकत मिलेगी। साथ ही, हार्मोंस बैलेंस में आए जाएंगे। रोजाना आधे घंटे अभ्यास करें। 

पहले तीन महीनों में : गर्भधारण करने के बाद भी ऊपर लिखे आसनों को करते रहें। साथ में हाथों की सूक्ष्म क्रियाएं, ताड़ासन, तितली आसन और डीप ब्रीदिंग जैसे अभ्यास भी करें। ऐसा कोई अभ्यास नहीं करें, जो पेट पर दबाव डालता हो। 

तीसरे से छठे महीने तक : तीन महीने बाद थोड़ी-सी स्पीड बढ़ा सकते हैं। इन महीनों में कटिचक्र आसन, पादोत्तान आसन, सेतुबंध आसन, वज्रासन और पैरों की सूक्ष्म क्रियाएं भी कर सकते हैं। साथ ही, लेटकर तितली और साइकलिंग के साथ-साथ भ्रामरी प्राणायाम भी करें। रोजाना आधा घंटा वॉक करें। गर्भावस्था का वक्त बढ़ने के साथ-साथ स्पीड कम होती जाएगी। अच्छे जूते पहनकर ही वॉक करें, वरना गिरने का खतरा रहेगा। स्विमिंग भी कर सकती हैं। 

आखिरी तीन महीनों में : डीप ब्रीदिंग, अनुलोम-विलोम जैसी क्रियाएं ही करें। अगर कोई दिक्कत है तो अभ्यास में उसके मुताबिक बदलाव कर लेना चाहिए। वॉकिंग जारी रखें। घर के छोटे-मोटे काम भी करते रहें। लगातार सक्रिय रहने से नॉर्मल डिलिवरी होने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन अगर पहले अबॉर्शन हो चुका है तो आराम करना ही बेहतर होता है। 

नोट: ये अभ्यास क्रम सामान्य जानकारी के लिए है, लेकिन अगर किसी को डायबीटीज, बीपी, कमरदर्द, मोटापा जैसी दिक्कत है तो उसी के मुताबिक अभ्यास में बदलाव किया जाना चाहिए। जिस महिला का पहले अबॉर्शन हो चुका है या जुड़वां बच्चे हैं, उन्हें एक्सरसाइज नहीं करनी चाहिए। 

प्रीनेटल वर्कशॉप 

आजकल प्रीनेटल वर्कशॉप और प्रोग्राम काफी चलन में हैं। इनमें आनेवाले बच्चे के लिए पैरंट्स को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से तैयार किया जाता है। खासतौर पर मेट्रो में रहनेवाली सिंगल परिवारों के लिए ये क्लासें काफी मददगार साबित होती हैं। उन्हें डिलिवरी का विडियो दिखाया जाता है, बेबी के सामान और उसका ख्याल रखने के बारे में बताया जाता है। प्रेग्नेंसी से पहले, प्रेग्नेंसी के दौरान और डिलिवरी के बाद भी ये वर्कशॉप अटैंड की जा सकती हैं। ऐसा ही 'इनफेंट सिद्धा प्रोग्राम' चलानेवाली सिद्ध समाधि योग से जुड़ीं कोमल क्वात्रा के मुताबिक ये प्रोग्राम बच्चे के फिजिकल, इमोशनल, सोशल और स्प्रिचुअल डिवेलपमेंट में मदद करते हैं। 

साइंटिफिक तरीके से डिजाइन किए गए इन प्रोग्राम्स में ऑडियोविजुअल और स्टडी मटीरियल के जरिए पैरंट्स को जानकारी दी जाती है। पैरंट्स बच्चे के नखरों और गुस्से को भी आसानी से हैंडल कर सकते हैं। प्रोग्राम ऑर्गनाइज करने वाली संस्थाओं का दावा है कि इनसे बच्चा बुद्धिमान होता है, उसकी मेमरी बढ़ती है और वह बिना किसी दबाव के अनुशासन में रहने लगता है। आमतौर पर प्रीनेटल कोर्सों में 10-15 क्लासें होती हैं और फीस 8 से 15 हजार रुपये तक होती है। 

म्यूजिक और मंत्र- इस दौरान गायत्री मंत्र का जाप या सुनना अच्छा होता है। वैसे, मार्केट में तमाम सीडी हैं, जो प्रेग्नेंसी को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं, जैसे कि गर्भसंस्कार, मेडिटेशन इन प्रेग्नेंसी, रिलैक्सिंग सीडी आदि। 

अच्छी किताबें पढ़ें : वॉट टु एक्सपेक्ट वेन यू आर एस्पेक्टिंग, जॉय ऑफ पैरंटिंग, युअर प्रेग्नेंसी वीक बाय वीक, प्रेग्नेंसी चाइल्डबर्थ एंड द न्यूबॉर्न, द प्रेग्नेंसी बुक, द प्रेग्नेंसी जैसी कई किताबें मार्केट में हैं, जो आपको प्रेग्नेंसी से जुड़ी सारी जानकारी बेहतरीन तरीके से मुहैया कराती हैं। इनमें से कुछ किताबें हिंदी में भी आ चुकी हैं। वैसे, वॉट टु...को इस विषय की बेहतरीन किताबों में से माना जाता है। 

पॉजिटिव सोचें : खुशनुमा वातावरण में रहें। जितना पॉजिटिव रहेंगी, बच्चे के लिए उतना ही अच्छा होगा। बच्चा मां के गर्भ से ही चीजों को जानने-समझने लगता है और उसी वक्त उसमें संस्कार पड़ने लगते हैं। मन में यह संशय न डालें कि बेटा होगा या बेटी। इससे बच्चे की शक्ति कम होगी। इमोशंस पर कंट्रोल के साथ ही मेंटली भी रिलैक्स रहें। बच्चे को विजुअलाइज करें कि आप अपना बच्चा कैसा चाहती हैं। उससे बात करें। यह कम्यूनिकेशन आपके और बच्चे के बीच में बंधन का काम करेगी। ये प्रोग्राम हमारी माइथॉलजी पर आधारित होते हैं और साइंटिफिकली अभी तक इनकी सत्यता साबित नहीं हुई है। 

ये सावधानियां बरतें 

- भारी वजन न उठाएं 

- ज्यादा डांस न करें 

- सीढ़ियां नहीं फांदें 

- हील न पहनें 

- ज्यादा ड्राइविंग न करें 

- लंबी यात्रा न करें 

- रस्सी न कूदें 

- कमर से झुकने के बजाय घुटने मोड़कर बैठें 

- बिना डॉक्टर की सलाह कोई दवा न लें 

स्मोकिंग और शराब का असर 

प्रेग्नेंसी के दौरान स्मोकिंग और ड्रिंकिंग से बचना चाहिए। अल्कोहल से बच्चे के लिवर को नुकसान पहुंच सकता है। वक्त से पहले डिलिवरी भी हो सकती है। बच्चे का साइज छोटा हो सकता है और बच्चे की सही ग्रोथ नहीं होगी। स्मोकिंग से प्लासेंटा सिकुड़ सकता है, जिससे बच्चे को पूरा खाना और हवा नहीं मिल पाएगी। 

मिसकैरेज की वजहें 

आमतौर पर मिसकैरेज की मेडिकल वजहें होती है मसलन, जिनेटिक वजहें, प्लासेंटा की स्थिति, वेजाइना में लगातार इन्फेक्शन, डायबीटीज की वजह से होनेवाला इन्फेक्शन, गलत मेडिसिन खाना आदि। पहले ट्राइमेस्टर में होनेवाले 90 फीसदी मिसकैरेज जिनेटिक वजहों से होते हैं। ज्यादा उछल-कूद, डांस, दूसरे बच्चे का बहुत जल्दी आना भी मिसकैरेज की वजह बन सकता है। एक बार मिसकैरेज होने पर तीन महीने बाद ही गर्भधारण करें। 

हाई रिस्क प्रग्नेंसी 

डायबीटीज 

मां बनने जा रही महिलाओं के लिए डायबीटीज बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है। जो पहले से डायबीटीज से पीड़ित हैं, उन्हें शुगर लेवल नॉर्मल (खाली पेट शुगर 95 से कम और खाने के बाद 130 से कम) आने पर गर्भधारण करना चाहिए। जिन महिलाओं के पैरंट्स को शुगर की हिस्ट्री रही है, उन्हें प्रेग्नेंसी प्लान करने से लेकर डिलिवरी तक खासतौर पर सचेत रहना चाहिए। 

जस्टेशनल डायबीटीज : नॉर्मल प्रेग्नेंसी में भी इंसुलिन की कार्यक्षमता 15 फीसदी कम हो जाती है। ऐसे में सेहतमंद महिलाओं में भी प्रेग्नेंसी के वक्त डायबीटीज (जस्टेशनल डायबीटीज) होने के मामले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं। बहुत सारे मामलों में चार हफ्ते बाद ही प्रेग्नेंसी और डायबीटीज दोनों का पता चलता है। इससे बच्चे को नुकसान होने की आशंका होती है क्योंकि शुरुआती महीनों में ही बच्चे के अंग बनते हैं, इसीलिए प्रेग्नेंसी प्लान करना हमेशा बेहतर रहता है। प्रेग्नेंसी के दौरान शुगर कंट्रोल में रखें क्योंकि सेकंड या थर्ड ट्राइमेस्टर में शुगर ज्यादा होती है तो बच्चे का साइज बड़ा हो सकता है, जिसकी वजह से सिजेरियन करना पड़ सकता है। 

प्रेग्नेंसी में हमेशा इंसुलिन ही लें। गोलियां बिल्कुल न लें क्योंकि इनसे बच्चे में डिफेक्ट आ सकता है। प्रेग्नेंसी के दौरान होनेवाले डायबीटीज के 90 फीसदी मामलों में डिलिवरी के बाद यह समस्या खत्म हो जाती है। हालांकि अगर वजन कंट्रोल में न रखा जाए तो ऐसे 40 फीसदी में चार साल के अंदर महिला को डायबीटीज हो जाती है। 

नोट: शुगर की मरीज महिलाएं वजन और शुगर लेवल कंट्रोल में रखें, आराम करें और खाने का ध्यान रखें। गर्भवती महिलाएं खाने को मीठा बनाने के लिए स्पारटम का इस्तेमाल कर सकती हैं। बच्चे को अपना दूध जरूर पिलाएं, क्योंकि कुछ लोगों को गलतफहमी होती है कि डायबीटिक मांओं को बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाना चाहिए। 

हाइपरटेंशन 

अगर मां को हाइपरटेंशन है तो बच्चे की ग्रोथ कम हो सकती है और वह काफी कमजोर हो सकता है। प्री-मच्योर डिलिवरी की आशंका भी बढ़ जाती है। 

हाइपोथायरॉडिज्म: हाइपर और हाइपो, दोनों तरह के थायरॉडिज्म में बच्चे के मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है। 

जॉन्डिस: अगर मां को पीलिया है तो डिलिवरी से पहले ही ब्लीडिंग हो सकती है। ऐसे केस में डिलिवरी हमेशा अच्छे हॉस्पिटल में ही कराएं। 

अबॉर्शन और सिजेरियन: अगर पहले अबॉर्शन हो चुका है या पहला बच्चा सिजेरियन है तो भी प्रेग्नेंसी हाई रिस्क कैटिगरी में आती है। ऐसे मामलों में बच्चों के बीच अच्छा गैप रखें। 

प्रेग्नेंसी और सेक्स 

- प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाएं काफी इमोशनल और संवेदनशील हो जाती हैं। अगर उन्हें लगता है कि उनका हस्बैंड उन पर ध्यान नहीं दे रहा, तो वे चिड़चिड़ी, अनिद्रा की शिकार और कम या ज्यादा भूख की मरीज हो जाती हैं। उनकी सेक्स की इच्छा कम हो जाती है। ऐसे में पति प्यार से पेश आए और पत्नी जिन बदलावों से गुजर रही है, उन्हें समझे। 

- पहले तीन महीनों और आखिरी तीन महीनों में सेक्स से बचें। कोई दिक्कत न हो तो सेकंड ट्राइमेस्टर में शारीरिक संबंध बना सकती हैं, लेकिन इस दौरान पोजिशन का ध्यान रखें और देखें कि पेट पर किसी तरह का दबाव न पड़े। 

- पुरुष को ऊपर नहीं रहना चाहिए। ऐसे में महिला को ऊपर रहने की सलाह दी जाती है या फिर दोनों सिटिंग पोजिशन में भी आ सकते हैं। 

क्या कहता है आयुर्वेद 

आयुर्वेद के मुताबिक महिला का रिप्रॉडक्टिव सिस्टम हीट ओरिएंटेड है, इसलिए गर्भवती महिला को गर्म तासीर की चीजें जैसे कि सौंठ, अदरक, गर्म मसाला, धनिया, मिर्च, केसर, नॉन-वेज ज्यादा नहीं खाना चाहिए। जैसे-जैसे बच्चे के शरीर के हिस्से बनने शुरू होते हैं, महिला में बदलाव आने लगते हैं। हार्मोंस बदलने से वह कुछ खास चीजें खानी की इच्छा जताती है लेकिन कोशिश करें कि वात, पित्त और कफ का बैलेंस बनाए रखें। आयुर्वेद प्रेग्नेंसी के पहले तीन महीनों में पपीता कम खाने की सलाह देता है। लेकिन एलोपैथी डॉक्टर इससे इत्तफाक नहीं रखते। 

प्रेग्नेंसी और मिथ 

-पपीता खाने से मिस कैरेज हो सकता है। 

आयुर्वेद इसे सही मानता है लेकिन कई डॉक्टर इसे सही नहीं मानते। जबकि कुछो ने पपीते खाने से मिस कैरेज होने वाली बात को सही कहा। दरअसल, कच्चे पपीता में एक एंजाइम होता है, जो जानवरों में अबॉर्शन के लिए जिम्मेदार होता है लेकिन इंसानों में अभी तक ऐसा कुछ प्रूव नहीं हुआ है। 

- मां को डायबीटीज है तो बच्चे को दूध नहीं पिलाना चाहिए। 

बिल्कुल गलत है। मां को बच्चे को अपना दूध जरूर पिलाना चाहिए। 

- ग्रहण के दौरान गर्भवती महिला घर से बाहर न निकले, चाकू आदि को हाथ न लगाए और कुछ न खाए। 

ग्रहण के वक्त पर कुछ किरणें ब्लॉक हो जाती हैं और कुछ अलग तरह की अल्ट्रावॉयलट किरणें निकलती हैं, जिनसे लोग मानते हैं कि बच्चे को नुकसान हो सकता है लेकिन अभी तक साइंटिफिकली ग्रहण का गर्भवती महिलाओं पर कोई बुरा असर साबित नहीं हुआ है। 

- बादाम, केसर, संतरा या नारियल खाने और नारियल पानी पीने से बच्चा गोरा होता है। 

ये तमाम चीजें स्किन के लिए अच्छी हैं, इसलिए इनसे बच्चे की स्किन भी अच्छी होती है, लेकिन गोरा होने का इनसे कोई ताल्लुक नहीं है। 

ध्यान दें 

- प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी दवा न लें। पेनकिलर, एंटी-बायॉटिक, कफ सिरप जैसी दवाएं कई बार लोग खुद ही ले लेते हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए। 

कपड़े कैसे पहनें 

आजकल माकेर्ट में तमाम मैटरनिटी वेयर आ गए हैं। ऐसे में आपके पास तमाम ऑप्शन हो सकते हैं। ध्यान रहे कि कपड़े सुविधाजनक भी हों। इस दौरान ज्यादा टाइट कपड़े पहनने से बचें। वैसे, आजकल इतने खूबसूरत ड्रेस माकेर्ट में उपलब्ध हैं कि आप अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान बेहद खूबसूरत दिख सकती हैं और इस हसीन पलों को और एंजॉय कर सकती हैं। 


एड्स -प्रेग्नेंट महिला को अपना एचआईवी टेस्ट जरूर कराना चाहिए। अगर मां एचआईवी पॉजिटिव है या उसे एड्स है तो बच्चे के पॉडिटिव होने की एक-तिहाई आशंका होती है। ऐसी महिलाओं को पूरी प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर की देखरेख में रहना चाहिए। कुछ डॉक्टर ये भी मानते हैं कि प्रेग्नेंट होने के बाद पॉजिटिव मां और बीमार हो सकती है। डिलिवरी से पहले मां को और बच्चा होते ही बच्चे को नेवरीपिन नाम की दवा की एक डोज दी जाती है। इससे बच्चे के एचआईवी पॉजिटिव होने की आशंका कुछ कम हो जाती है। एचआईवी से ग्रस्त मां को बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाना चाहिए। 

अबॉर्शन- पहले तीन महीने तक सेफ रहता है, हालांकि 20 हफ्ते तक अबॉर्शन कराना कानूनन जायज है। आमतौर पर बच्चे या मां के किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त होने पर ही डॉक्टर अबॉर्शन की सलाह देते हैं। अबॉर्शन दवा और ऑपरेशन, दोनों तरह से कराया जा सकता है। पहले 49 दिन तक डॉक्टर से पूछकर महिला अबॉर्शन के लिए मेडिसन ले सकती लेकिन इसके बाद ऑपरेशन से अबॉर्शन कराना ही सेफ रहता है। कई बार अबॉर्शन के बाद गर्भधारण करने में दिक्कत आ सकती है। अबॉर्शन के दौरान इन्फेक्शन होने या ट्यूब ब्लॉक होने पर ऐसा हो सकता है। 

खाने में फैट से बचना चाहिए क्योंकि ज्यादा फैट होगा तो खाना पचाने में दिक्कत होगी। बीपी भी बढ़ सकता है। इसके बजाय प्रोटीन से भरपूर डाइट लें। पपीता नहीं खाना चाहिए। पहले तीन महीने में पपीता और अनानास दोनों नहीं खाना चाहिए।   



पति-पत्नी में अनबन होना आम बात है क्योंकि जहां प्रेम होता है वहीं तकरार भी होती है। लेकिन कभी-कभी यह छोटी सी तकरार बढ़ा रूप ले लेती है। ऐसे में पति-पत्नी के बीच मनमुटाव अधिक हो जाता है और कई बार इसका परिणाम पति-पत्नी के रिश्ते को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इस समस्या से बचने के लिए नीचे एक मंत्र दिया गया है। यदि इसका विधि-विधान से जप किया जाए तो पति-पत्नी के बीच कभी अनबन नहीं होती साथ ही प्रेम और प्रगाढ़ होता जाता है।
मंत्र:-

अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समंजनम्।
 

अंत: कृणुष्व मां ह्रदि मन इन्नौ सहासति।।
 

जप विधि
 :-

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर एकांत स्थान पर कुश का आसन लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके उस पर बैठ जाएं। अब सामने मां पार्वती का चित्र स्थापित कर उसका पूजन करें। इसके बाद इस मंत्र का यथाशक्ति या कम से कम 21 बार जप करें। कुछ ही दिनों में आपको इस मंत्र का असर दिखने लगेगा। अगर किसी कारणवश आप इस मंत्र का जप नहीं कर सकते तो यह जप किसी ब्राह्मण द्वारा भी करवाया जा सकता है।


पति-पत्नी में विवाद आम बात है क्योंकि जहां प्यार होता है तकरार भी वहीं होती है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है पति बिना किसी बात के ही अपनी पत्नी पर गुस्सा करने लगते हैं और धीरे-धीरे यह उनका आदत बन जाती है। अगर आपके साथ भी यही समस्या है तो नीचे लिखा उपाय करें।

उपाय

जिस स्त्री का पति हर समय बिना बात के ही गुस्सा करता रहता है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार, सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार को एक नए सफेद कपड़े में एक डली गुड़, चांदी एवं तांबे के दो सिक्के, एक मुट्ठी नमक व गेहूं को बांधकर अपने शयनकक्ष में कहीं ऐसी जगह छिपा कर रख दें। इसके प्रभाव से पति का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगेगा।

what-women-wantअगर पुरुष अपने साथी के साथ एक अच्छा रिश्ता कायम रखना चाहते हैं तो उनके लिए यह ज़रुरी हो जाता है कि वह महिलाओं की इच्छाओं और चाहतों को जानें. उन्हें मालूम होना चाहिए कि महिलाओं को क्या अच्छा लगता है. इसके अलावा पुरुष को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि महिलाएं कभी भी उनसे अपनी इच्छाएं ज़ाहिर नहीं करेंगी. परन्तु अगर आप इन टिप्स को अपनाएं तो आप उन्हें खुश रख सकते हैं.

1. पुरुष जब भी महिलाओं से बात करें तो ध्यान दें कि ऐसा कुछ भी ना बोलें जिससे महिलाओं की भावनाओं को ठेस पहुंचे.

2. शादी शुदा मर्दों को ध्यान रखना चाहिए कि महिलाएं अगर खुश हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि उनका मूड सेक्स करने का है.

3. महिलाएं बहुत संवेदनशील होती हैं. अतः पुरुषों को उनकी संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए.

4. महिलाओं को बातें करने का शौक होता है, उनसे जितनी भी बातें करो वह कभी नहीं थकतीं.

5. महिलाओं के दोस्तों के साथ भी आप शिष्टता से बर्ताव करें.

6. मौका मिले तो आप महिलाओं की जगह खुद खाना बनाएं.

7. अगर महिलाओं के साथ घूमने जाना है तो गाड़ी को तेज़ नहीं चलाना चाहिए.

8. कभी महिलाओं को अपने से नीचे ना समझें.

9. उन्हें प्यार दें.

10. और अंतिम बात खास तौर से ध्यान रहे कि महिलाओं से कभी झूठ न बोलें.


पति-पत्‍नी के बीच यौन संबंध का एक लक्ष्‍य माता-पिता बनना भी होता है। वात्‍सयायन के कामसूत्र में संभोग की स्थितियों यानी पोजीशंस के बारे में बताया गया है। इसी में ऐसी पोजीशन भी बताई गई हैं, जिनमें संभोग करने से गभीधारण आसान हो जाता है। आज हम आपको कुछ पोजीशंस बताएंगे, जो गर्भधारण में सहायक होती हैं। साथ ही हम आपको कुछ टिप्‍स भी देंगे-

गर्भधारण के लिए दो पोजीशन में सेक्‍स करना फलदायक रहता है- 

मिशनरी पोजीशन: इस स्थिति में संभोग के समय पुरुष ऊपर की ओर होता है। इस पोजीशन में संभोग करने से पुरुष का वीर्य सीधे स्‍त्री के गर्भाशय तक सीधा पहुंचता है। पुरुष के ऊपर रहने से गर्भधारण आसान हो जाता है। इसके विपरीत यदि स्‍त्री ऊपर की ओर रहती है, तो गर्भधारण की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं।

हैंड एण्‍ड नी पोजीशन (डॉगी स्‍टाइल): इस पोजीशन में स्‍त्री घुटनों और हाथ के बल लेट जाती है और पुरुष पीछे की ओर से संभोग करता है। ऐसी स्थिति में वीर्य आसानी से महिला के गर्भाशय तक आसानी से पहुंचता है। 
कुछ देर आराम करें

यदि आप गर्भधारण करना चाहती हैं, तो उपर्युक्‍त दोनों पोजीशंस पर संभोग करने के बाद कुछ देर आराम करें। बेड पर कूदें नहीं। चाहे जितने जरूरी काम क्‍यों न हों, संभोग के तुरंत बाद बिस्‍तर से उठने की जरूरत नहीं। यदि आपने मिशनरी पोजीशन में सेक्‍स किया है, तो संभोग करते समय या फिर संभोग के बाद स्‍त्री अपनी कमर के नीचे तकिया लगा लें, ताकि वीर्य गुरुत्‍वाकर्षण बल के जरिए नीचे की ओर आसानी से पहुंच सके। यदि संभोग के समय ही तकिया लगा लिया है तो अच्‍छा रहता है। ऐसे में कम से कम आधे घंटे तक स्‍त्री को शांतिपूर्वक लेटे रहना चाहिए।

कुछ लोग मानते हैं कि संभोग के बाद यदि स्‍त्री पीठ के बल लेटकर अपने पैर ऊपर कर के थोड़ी देर लेटी रहे तो गर्भधारण की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा करना फलदायक हो सकता है। हालांकि यह बात अभी तक सिद्ध नहीं हुआ है।
कौन स समय सही 

कुछ लोगों का मानना है कि दिन के समय सेक्‍स करने गर्भधारण की संभावना अधिक रहती है। इसके पीछे उनका तर्क यह होता है कि रात्रि की तुलना में दिन में वीर्य में शुक्राणु की संख्‍या अधिक होती है।

वहीं हाल ही में हुए एक शोध में पता चला है कि गर्भधारण के लिए सेक्‍स का सही समय शाम पांच से सात बजे के बीच का होता है। इस दौरान वीर्य में शुक्राणु की संख्‍या करीब 35 प्रतिशत तक ज्‍यादा होती है। शाम का यह समय ऐसा होता है, जब महिला के अंडाशय ज्‍यादा जल्‍दी क्रिया करते हैं। हालांकि यहां स्‍त्री को मासिक धर्म का ध्‍यान रखें।
इन पोजीशन में न करें सेक्‍स 

यदि आप गर्भधारण चाहती हैं, तो इन बातों को जरूर ध्‍यान रखें, जो आपको नहीं करनी हैं। पहली यह कि संभोग के दौरान महिला ऊपर नहीं हो। ऐसे में शुक्राणु सर्विक्‍स के पास जमा हो जाते हैं। और थोड़ी ही देर में वापस लौट आते हैं, जिस कारण वो अंडाशय तक पहुंच नहीं पाते।
इसके अलावा बैठकर, बगल में लेटकर और खड़े होकर सेक्‍स नहीं करें। इन सभी स्थितियों में शुक्राणुओं के गर्भाशय के पास जमा होने की संभावना ज्‍यादा होती है। हां कई बार वीर्य के निकलते समय शुक्राणु की गति अधिक होती है और ज्‍यादा संवेग होने के कारण शुक्राणु अपने लक्ष्‍य तक पहुंच जाते हैं और गर्भधारण हो जाता है।

modern love लैला–मजनू, हीर–राँझा प्यार की वह दास्तां बयां करते हैं जब प्रेमी प्यार को पूजते थे. प्यार में पागल प्रेमी एक दूसरे को पाने के लिए बेताब थे और जीवन क्या मृत्यु के बाद भी वह एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते थे.

अब जमाना बदल गया है. आजकल लोग प्यार में पागल नहीं होते. हम कह सकते हैं कि ज़माने के साथ-साथ प्यार करने के तरीके में बदलाव आया है. इसे हम कायापलट कहें या लोगों की मानसिकता का नया स्वरुप, बात तो इतनी है कि प्यार करने का ढंग बदल गया है

चूंकि प्यार की इबारत बार–बार लिखी जाती है तो आइए नज़र डालते हैं प्यार के नए स्वरुप पर.

• अपने साथी से अनुचित मांग न करें. एक दूसरे को समझना प्यार की सबसे बड़ी कुंजी होती है.

• कभी भी प्यार के रूल्स न ब्रेक करें क्योंकि प्यार का स्थायित्व भरोसा है.

• अगर प्यार में कोई अनबन हो तो उसे एक साथ सुलझाएं और कभी भी ऐसा लगे कि देर हो गयी है तो एक-दूसरे का साथ छोड़ने में देरी नहीं करनी चाहिए.


• प्यार में समझौता नहीं होता है.

modern-love• कभी भी अपने सबसे अच्छे दोस्त से इस बात पर प्यार ना करने लगें कि वह आपके सुख-दुःख के समय आपके साथ था. क्योंकि खुदा ना करे कि अगर आप दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आई तो उस समय आप उससे आंख नहीं मिला सकते हैं.

• हमेशा अपने दिल की सुनें, क्योंकि दिल हमेशा सच्ची बात करता है.

• अत्यधिक सावधानी और धैर्य रिश्तों में मजबूती लाता है.

• एक दूसरे को समझने के लिए अधिक से अधिक समय लें, क्योंकि समय रिश्तों में मजबूती लाता है.

• और अंत में उसी से प्यार करें जो आपके अहंकार को झेल सके.

पुत्र प्राप्ति के लिए 


मनपंसद संतान-प्राप्ति के यो

स्त्री के ऋतु दर्शन के सोलह रात तक ऋतुकाल रहता है,उस समय में ही गर्भ धारण हो सकता है,उसके अन्दर पहली चार रातें निषिद्ध मानी जाती है,कारण दूषित रक्त होने के कारण कितने ही रोग संतान और माता पिता में अपने आप पनप जाते है,इसलिये शास्त्रों और विद्वानो ने इन चार दिनो को त्यागने के लिये ही जोर दिया है।
चौथी रात को ऋतुदान से कम आयु वाला पुत्र पैदा होता है,पंचम रात्रि से कम आयु वाली ह्रदय रोगी पुत्री होती है,छठी रात को वंश वृद्धि करने वाला पुत्र पैदा होता है,सातवीं रात को संतान न पैदा करने वाली पुत्री,आठवीं रात को पिता को मारने वाला पुत्र,नवीं रात को कुल में नाम करने वाली पुत्री,दसवीं रात को कुलदीपक पुत्र,ग्यारहवीं रात को अनुपम सौन्दर्य युक्त पुत्री,बारहवीं रात को अभूतपूर्व गुणों से युक्त पुत्र,तेरहवीं रात को चिन्ता देने वाली पुत्री,चौदहवीं रात को सदगुणी पुत्र,पन्द्रहवीं रात को लक्ष्मी समान पुत्री,और सोलहवीं रात को सर्वज्ञ पुत्र पैदा होता है। इसके बाद की रातों को संयोग करने से पुत्र संतान की गुंजायश नही होती है। इसके बाद स्त्री का रज अधिक गर्म होजाता है,और पुरुष के वीर्य को जला डालता है,परिणामस्वरूप या तो गर्भपात हो जाता है,अथवा संतान पैदा होते ही खत्म हो जाती है।




गर्भिणी स्त्री ढाक (पलाश) का एककोमल पत्ता घोंटकर गौदुग्ध के साथ रोज़ सेवन करे | इससे बालक शक्तिशाली और गोरा होता है | माता-पीता भले काले हों, फिर भी बालक गोरा होगा | इसके साथ सुवर्णप्राश की २-२ गोलियां लेने से संतान तेजस्वी होगी |
विच्चें।

               कैसे हो पुत्र की प्राप्‍ति ?


प्रश्‍न : पुत्र प्राप्ति हेतु किस समय संभोग करें ?

उत्तर : इस विषय में आयुर्वेद में लिखा है कि
गर्भाधान ऋतुकाल की आठवीं, दसवी और बारहवीं रात्रि को ही किया जाना चाहिए। जिस दिन मासिक ऋतुस्राव शुरू हो उस दिन व रात को प्रथम मानकर गिनती करना चाहिए। छठी, आठवीं आदि सम रात्रियाँ पुत्र उत्पत्ति के लिए और सातवीं, नौवीं आदि विषम रात्रियाँ पुत्री की उत्पत्ति के लिए होती हैं। इस संबंध में ध्यान रखें कि इन रात्रियों के समय शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रात वाला पखवाड़ा भी हो, यह अनिवार्य है, यानी कृष्ण पक्ष की रातें हों। इस संबंध में अधिक जानकारी हेतु इसी इसी चैनल के होमपेज पर 'गर्भस्थ शिशु की जानकारी' पर क्लिक करें।
प्रश्न : सहवास से विवृत्त होते ही पत्नी को तुरंत उठ जाना चाहिए या नहीं? इस विषय में आवश्यक जानकारी दें ?

उत्तर : सहवास से निवृत्त होते ही पत्नी को दाहिनी करवट से 10-15 मिनट लेटे रहना चाहिए, एमदम से नहीं उठना चाहिए। पर्याप्त विश्राम कर शरीर की उष्णता सामान्य होने के बाद कुनकुने गर्म पानी से अंगों को शुद्ध कर लें या चाहें तो स्नान भी कर सकते हैं, इसके बाद पति-पत्नी को कुनकुना मीठा दूध पीना चाहिए।

प्रश्न : मेधावी पुत्र प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए ?

उत्तर : इसका उत्तर देना मुश्किल है,
प्रश्न : संतान में सदृश्यता होने का क्या कारण होता है ?

उत्तर : संतान की रूप रेखा परिवार के किसी सदस्य से मिलती-जुलती होती है,

   पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका
हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।

यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।

* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।

* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।

* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।

* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।

* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।

* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।

* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।

* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।

* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।

* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।

* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।

* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।

* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।

व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि पूर्णरूप से की है।

* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।

* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।

* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।

* जापान के सुविख्यात चिकित्सक डॉ. कताज का विश्वास है कि जो औरत गर्भ ठहरने के पहले तथा बाद कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थ तथा औषधि का इस्तेमाल करती है, उसे अक्सर लड़का तथा जो मेग्निशियमयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, अंडा आदि का इस्तेमाल करती है, उसे लड़की पैदा होती है।

विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है। उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।



पुत्र प्राप्ति का साधन है शीतला षष्ठी व्रत  पुत्र प्राप्ति का साधन है शीतला षष्ठी व्रत
माघ शुक्ल षष्ठी को संतानप्राप्ति की कामना से शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाता है। कहीं-कहीं इसे 'बासियौरा' नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर मां शीतला देवी का षोडशोपचार-पूर्वक पूजन करना चाहिये। इस दिन बासी भोजन का भोग लगाकर बासी भोजन ग्रहण किया जाता है।

शीतला षष्ठी व्रतकथा
एक ब्राह्मण के सात बेटे थे। उन सबका विवाह हो चुका था, लेकिन ब्राह्मण के बेटों को कोई संतान नहीं थी। एक दिन एक वृद्धा ने ब्राह्मणी को पुत्र-वधुओं से शीतला षष्ठी का व्रत करने का उपदेश दिया। उस ब्राह्मणी ने श्रद्धापूर्वक व्रत करवाया। वर्ष भर में ही उसकी सारी वधुएं पुत्रवती हो गई।

एक बार ब्राह्मणी ने व्रत की उपेक्षा करके गर्म जल से स्नान किया। भोजना ताजा खाया और बहुओं से भी वैसा करवाया। उसी रात ब्राह्मणी ने भयानक स्वप्न देखा। वह चौंक पड़ी। उसने अपने पति को जगाया; पर वह तो तब तक मर चुका था। ब्राह्मणी शोक से चिल्लाने लगी। जब वह अपने पुत्रों तथा बधुओं की ओर बढ़ी तो क्या देखती है कि वे भी मरे पड़े हैं। वह धाड़ें मारकर विलाप करने लगी। पड़ोसी जाग गये। उसे पड़ोसियों ने बताया- ''ऐसा भगवती शीतला के प्रकोप से हुआ है।''
ऐसा सुनते ही ब्राह्मणी पागल हो गई। रोती-चिल्लाती वन की ओर चल दी। रास्ते में उसे एक बुढ़िया मिली। वह अग्नि की ज्वाला से तड़प रही थी। पूछने पर मालूम हुआ कि वह भी उसी के कारण दुखी है। वह बुढ़िया स्वयं शीतला माता ही थी। अग्नि की ज्वाला से व्याकुल भगवती शीतला ने ब्राह्मणी को मिट्टी के बर्तन में दही लाने के लिए कहा। ब्राह्मणी ने तुरन्त दही लाकर भगवती शीतला के शरीर पर दही का लेप किया। उसकी ज्वाला शांत हो गई। शरीर स्वस्थ होकर शीतल हो गया।

ब्राह्मणी को अपने किए पर बड़ा पश्चाताप हुआ। वह बार-बार क्षमा मांगने लगी। उसने अपने परिवार के मृतकों को जीवित करने की विनती की। शीतला माता ने प्रसन्न होकर मृतकों के सिर पर दही लगाने का आदेश दिया। ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। उसके परिवार के सारे सदस्य जीवित हो उठे। तभी से इस व्रत का प्रचलन हुआ। ऐसी मान्यता है।

 

 

 

पुत्र प्राप्ति के लिए अहोई अष्टमी व्रत की परम्परा


कार्तिक माह में कश्ष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्रवती स्त्रियां निर्जल व्रत रखती हैं। संध्या समय दीवार पर आठ कानों वाली एक पुतली अंकित की जाती है। जिस स्त्री को बेटा हुआ हो अथवा बेटे का विवाह हुआ हो तो उसे अहोई माता का उजमन करना चाहिए। एक थाली में सात जगह चार-चार पूडयां रखकर उन पर थोडा-थोडा हलवा रखें। इसके साथ ही एक साडी ब्लाउज उस पर सामर्थ्यानुसार रुपए रखकर थाली के चारों ओर हाथ फेरकर श्रद्धापूर्वक सास के पांव छूकर वह सभी सामान सास को दे दें। हलवा पूरी लोगों को बांटें। पुतली के पास ही स्याऊ माता व उसके बच्चे बनाए जाते हैं। इस दिन शाम को चंद्रमा को अर्ध्य देकर कच्चा भोजन खाया जाता है तथा यह कथा पढी जाती है-
कथा
ननद-भाभी एक दिन मिट्टी खोदने गई। मिट्टी खोदते-खोदते ननद ने गलती से स्याऊ माता का घर खोद दिया। इससे स्याऊ माता के अण्डे टूट गये व बच्चे कुचले गये। स्याऊ माता ने जब अपने घर व बच्चों की दुर्दशा देखी तो क्रोधित होकर ननद से बोली कि तुमने मेरे बच्चों को कुचला है। मैं तुम्हारे पति व बच्चों को खा जाउंगी।
स्याऊ माता को क्रोधित देख ननद तो डर गई। पर भाभी स्याऊ माता के आगे हाथ जोडकर विनती करने लगी तथा ननद की सजा स्वयं सहने को तैयार हो गई। स्याऊ माता बोलीं कि मैं तेरी कोख व मांग दोनों हरूंगी। इस पर भाभी बोली कि मां तेरा इतना कहना मानो कोख चाहे हर लो पर मेरी मांग न हरना। स्याऊ माता मान गईं।
समय बीतता गया। भाभी के बच्चा पैदा हुआ और शर्त के अनुसार भाभी ने अपनी पहली संतान स्याऊ माता को दे दी। वह छह पुत्रों की मां बनकर भी निपूती ही रही। जब सातवीं संतान होने का समय आया तो एक पडोसन ने उसे सलाह दी कि अब स्याऊ मां के पैर छू लेना, फिर बातों के दौरान बच्चे को रुला देना। जब स्याऊ मां पूछे कि यह क्यों रो रहा है तो कहना कि तुम्हारे कान की बाली मांगता है। बाली देकर ले जाने लगे तो फिर पांव छू लेना। यदि वे पुत्रवती होने का आर्शीवाद दें तो बच्चे को मत ले जाने देना।
सातवीं संतान हुई। स्याऊ माता उसे लेने आईं। पडोसन की बताई विधि से उसने स्याऊ के आंचल में डाल दिया। बातें करते-करते बच्चे को चुटकी भी काट ली। बालक रोने लगा तो स्याऊ ने उसके रोने का कारण पूछा तो भाभी बोलीं कि तुम्हारे कान की बाली मांगता है। स्याऊ माता ने कान की बाली दे दी। जब चलने लगी तो भाभी ने पुनः पैर छुए, तो स्याऊ माता ने पुत्रवती होने का आर्शीवाद दिया तो भाभी ने स्याऊ माता से अपना बच्चा मांगा और कहने लगीं कि पुत्र के बिना पुत्रवती कैसे?
स्याऊ माता ने अपनी हार मान ली। तथा कहने लगीं कि मुझे तुम्हारे पुत्र नहीं चाहिएं मैं तो तुम्हारी परीक्षा ले रही थी। यह कहकर स्याऊ माता ने अपनी लट फटकारी तो छह पुत्र पश्थ्वी पर आ पडे। माता ने अपने पुत्र पाए तथा स्याऊ भी प्रसन्न मन से घर गईं।
मंत्र

 संक्षिप्त :-
पुत्र प्राप्ति के लिए संतान गणपति स्तोत्र
 विस्तार :-
पुत्र प्राप्ति के लिए संतान गणपति स्तोत्र
नमो स्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च ।
सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च ।।
गुरूदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते ।
गोप्याय गोपिताशेषभुवना चिदात्मने ।।
वि
Ÿवमूलाय भव्याय विŸवसृष्टिकराय ते ।
नमो नमस्ते सत्याय सत्यपूर्णाय शुण्डिने ।।
एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नम: ।
प्रपन्नजनपालाय प्रणतार्तिविनाशिने ।।
शरणं भव देवेश संतति सुदृढां कुरू ।
भवष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक ।।
ते सर्वे तव पूजार्थे निरता: स्युर्वरो मत: ।
पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्वसिद्धप्रदायकम् ।।

   सावन में भगवान पार्थिव लिंग के अभिषेक

शिव की प्रसन्नता के लिए शिव स्तुति और स्त्रोत का पाठ करने का विशेष महत्व है। इन स्त्रोतों में शिव महिम्र स्त्रोत सबसे प्रभावी माना जाता है। इस स्त्रोत का पूरा पाठ तो शुभ फल देने वाला है ही, बल्कि यह ऐसा देव स्त्रोत है, जिसका कामना विशेष की पूर्ति के लिए प्रयोग भी निश्चित फल देने वाला होता है।
शिव महिम्र स्त्रोत के इन प्रयोगों में एक है - पुत्र प्राप्ति प्रयोग। पुत्र की प्राप्ति दांपत्य जीवन का सबसे बड़ा सुख माना जाता है। इसलिए हर दंपत्ति ईश्वर से पुत्र प्राप्ति की कामना करता है। अनेक नि:संतान दंपत्ति भी पुत्र प्राप्ति के लिए धार्मिक उपाय अपनाते हैं। शास्त्रों में शिव महिम्र स्त्रोत के पाठ से पुत्र प्राप्ति का उपाय बताया है। जानते है प्रयोग विधि -
- पुत्र प्राप्ति का यह उपाय विशेष तौर पर सावन माह से शुरु करें।
- स्त्री और पुरुष दोनों सुबह जल्दी उठे। स्त्री इस दिन उपवास रखे।
- पति-पत्नी दोनों साथ मिलकर गेंहू के आटे से ११ पार्थिव लिंग बनाए। पार्थिव लिंग विशेष मिट्टी के बनाए जाते हैं।
- पार्थिव लिंग को बनाने के बाद इनका शिव महिम्र स्त्रोत के श्लोकों से पूजा और अभिषेक के ११ पाठ स्वयं करें। अगर ऐसा संभव न हो तो पूजा और अभिषेक के लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय है कि यह कर्म किसी विद्वान ब्राह्मण से कराएं। पार्थिव लिंग निर्माण और पूजा भी ब्राह्मण के बताए अनुसार कर सकते हैं।
- पार्थिव लिंग के अभिषेक का पवित्र जल पति-पत्नी दोनों पीएं और शिव से पुत्र पाने के लिए प्रार्थना करें।
- यह प्रयोग २१ या ४१ दिन तक पूरी श्रद्धा और भक्ति से करने पर शिव कृपा से पुत्र जन्म की कामना शीघ्र ही पूरी होती है।
पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका

* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।

* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।

* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।

* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।

* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।

* कुछ विशिष्ट पंडितों तथा ज्योतिषियों का कहना है कि सूर्य के उत्तरायण रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्र तथा दक्षिणायन रहने की स्थिति में गर्भ ठहरने पर पुत्री जन्म लेती है। उनका यह भी कहना है कि मंगलवार, गुरुवार तथा रविवार पुरुष दिन हैं। अतः उस दिन के गर्भाधान से पुत्र होने की संभावना बढ़ जाती है। सोमवार और शुक्रवार कन्या दिन हैं, जो पुत्री पैदा करने में सहायक होते हैं। बुध और शनिवार नपुंसक दिन हैं। अतः समझदार व्यक्ति को इन दिनों का ध्यान करके ही गर्भाधान करना चाहिए।

* जापान के सुविख्यात चिकित्सक डॉ. कताज का विश्वास है कि जो औरत गर्भ ठहरने के पहले तथा बाद कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थ तथा औषधि का इस्तेमाल करती है, उसे अक्सर लड़का तथा जो मेग्निशियमयुक्त भोज्य पदार्थ जैसे मांस, मछली, अंडा आदि का इस्तेमाल करती है, उसे लड़की पैदा होती है।

विश्वविख्यात वैज्ञानिक प्रजनन एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. लेण्डरम बी. शैटल्स ने हजारों अमेरिकन दंपतियों पर प्रयोग कर प्रमाणित कर दिया है कि स्त्री में अंडा निकलने के समय से जितना करीब स्त्री को गर्भधारण कराया जाए, उतनी अधिक पुत्र होने की संभावना बनती है। उनका कहना है कि गर्भधारण के समय यदि स्त्री का योनि मार्ग क्षारीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्र तथा अम्लीय तरल से युक्त रहेगा तो पुत्री होने की संभावना बनती है।

पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका
हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है।
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि
 पूर्णरूप से की है।


लक्ष्मी, ऐश्वर्य,वशीकरहण,उच्चाटन,पुत्र प्राप्ति,राज

 सम्मान,सुख और संपत्ति की प्राप्ति के मार्ग

                    
HAWAN

नवरात्रों के प्रारम्भ होने से पूर्व अपने सभी मित्रों को बताने का प्रयास कर रहा कि हमें आराधना करते समय और भगवान से कुछ मांगते समय किन किन नियमो का पालन करना चाहिऐ। हम मन से भगवान कि प्रार्थना कर रहें परन्तु उसके पश्चात भी हमारी कामना पुर्ण नहीं हो पा रही हैं इसके लिये भगवान को दोष देते हैं जो ठिक नहीं मैं जो जानता हुं अपके सामने रख कर प्रयास कर चाहता हुं कि आप भी उन नियमो का पालन करे जो शास्त्रो में लिखे हैं इन्हीं के आधार पर हमारें पुर्वजो ने राजा,महाराजाओं को लक्ष्मी, ऐश्वर्य,वशीकरहण,उच्चाटन,पुत्र प्राप्ति,राज सम्मान,सुख और संपत्ति की प्राप्ति के मार्ग दिखाये थे। आप भी इन्हें प्रयो्र में लाये और लाभ उठायें।- लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले रंग के आसन का प्रयोग करें।
- वशीकरहण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले रंग के आसन का प्रयोग करें। बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का आसन का प्रयोग करें।
- सात्विक साधनाओं, प्रयोगां के लिए कुशा के बने आसन का प्रयोग करें।
- वस्त्र - लक्ष्मी संबंधी प्रेयोगों में आप पीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें। यदि पीले वस्त्र न हों तो मात्र धोती पहन लें एवं उपर शाल लपेट लें। आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में भिगोंकर पीला भी रंग सकते हैं।
हवन- जायफल से कीर्ति और किशमिश से कार्य की सिद्धि होती है।
आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें।
खांड, घी, गेंहूं, शहद, जौं, तिल, बिल्वपत्र, नारियल, किशमिश और कहदंब से हवन करें।
गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
खीर से परिवार, वृद्धि, चम्पा के पुष्पों से धन और सुख की प्राप्ति होती है।
आवंले से कीर्ति और केले से पुत्र प्राप्ति होती है।
कमल से राज सम्मान और किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है।
खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। 
व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यंत नम्रता के साथ प्रणाम करें और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दें इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।
नवार्ण मंत्र को मंत्रराज कहा गया है।
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डयै विच्चे ।
शीघ्र विवाह के लिएक्लीं ऐं ह्रीं चामुण्डायै विच्चे।लक्ष्मी प्राप्ति के लिए स्फटिक की माला पर।
ओंम ऐं हृी क्लीं चामुणयै विच्चे।
परेशानियो के अन्त के लियक्लीं ह्री ऐं चामुण्डायै


 व्यर्थ के स्खलन से बचें
शीघ्रपतन और स्वप्नदोष का निदान
स्वप्न दोष या ‍शीघ्रपतन के कारण अधिकांश युवक इस रोग से परेशान हैं और अधिकांश को मालूम ही नहीं कि ये किस किस्म का रोग है। दोनों ही रोगों का मूल कारण संभोग की कल्पना और स्नायु दुर्बलता माना गया है। इसके अलावा भी कई कारण हैं। इसका निदान भी बहुत सरल है। 
 स्वप्नदोष : जैसा कि इसका नाम ही है स्वप्न दोष अर्थात जब व्यक्ति किसी भी प्रकार के संभोग की कल्पना करता है तो अकसर रात में उसे संभोग के सपने सताते हैं। ऐसा तब भी होता है जबकि व्यक्ति गर्म वस्तुएँ जैसे अंडा, माँस, मछली, तली-भुनी चीजें, अत्यधिक चाय या कॉफी, सिगरेट या अन्य तरह के व्यसन का सेवन करता है। 
यदि इस रोग पर ध्यान न दिया ‍गया तो सिरदर्द, चक्कर और मानसिक तथा शारीरिक कमजोरियों के लक्षण उबरने लगते हैं। आगे चलकर स्नाविक दुर्बलता, धातु दुर्बलता और अंततः व्यक्ति नपुसंक रोग से ग्रस्त हो जाता है। पहले स्वप्न के ‍फिर बिना स्वप्न के ही वीर्य स्खलन होने लगता है।
शीघ्रपतन : शीघ्रपतन का अर्थ है स्त्री के यौन सुख प्राप्त करने के पहले ही पुरुष का शीघ्र ही स्खलित हो जाना। दरअसल पुरुष के तुरंत ही उत्तेजित हो जाने के कारण वह तुरंत ही स्खलित हो जाता है।
दूसरा कारण स्वप्नदोष, धातु दुर्बलता और स्नायु दुर्बलता है। उक्त रोग के कारण भी शीघ्रपतन की शिकायत बनी रहती है। दरअसल इस रोग में व्यक्ति के भीतर संयम की शक्ति पूरी तरह से क्षीण हो जाती है। स्त्री द्वारा यौन सुख के लिए तैयार होने तक वह स्वयं को संयमित करने के प्रयास अवश्य करता है किंतु असफल रहता है।
उपचार :
पहले तो उपरोक्त बताए गए कारणों को समझें और भोजन में परिवर्तन कर दें। अनियमित जीवनशैली को त्याग दें। तेज धूप, धूल और धुएँ से बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करें। इस दौरान नियमित योगासनों का अभ्यास और प्रतिदिन आधे घंटे के लिए योग-निद्रा करें, तब पाँच मिनट का ध्यान करें। खुली और ताजी हवा में प्राणायाम करें। गहरी श्वास लेने और छोड़ने से रक्त प्रवाह बढ़ेगा और वायुदोष मिटेगा।
विशेष आहार :
शहद तथा भीगे हुए बादाम या किशमिश को दूध में मिलाकर प्रतिदिन सुबह पीएँ। 8-10 बादाम, 25 दाने किशमिश तथा 7-8 मनुक्के भिगोकर नाश्ते में ले सकते हैं। हरी सब्जी और छिलकों वाली दाल का उपयोग पतली चपाती के साथ करें। चपाती मक्खन या मलाई के साथ लें। भोजन में सलाद का भरपूर उपयोग और प्याज, लहसुन तथा अदरक का संतुलित सेवन करें।
योग पैकेज :
नियमित योगासनों का अभ्यास और प्रतिदिन आधे घंटे योग-निद्रा करना इसकी मुख्य चिकित्सा है। योगासनों में प्रारंभ में कमर चक्रासन, जानुशिरासन, सुप्तवज्रासन, भुजंगासन, हलासन, हस्तपादोत्तनासन, योगमुद्रा, पवनमुक्तासन तथा मकरासन करें। फिर धीरे-धीरे खुली और स्वच्छ हवा में नाड़ी शोधन प्राणायम का अभ्यास करें। तब कपालभाँति तथा भ्रामरी का अभ्यास करें। बंधों में उड्डियान बंध
 लगाएँ। सप्ताह में एक बार तेल मालिश अवश्य कराएँ। यह सब करें किसी योग्य योग चिकित्सक की सलाह पर 
नपुंसकता, शिश्न शिथिलता या यौन दौर्बल्यता          
जो पुरुष जन्मजात नपुंसक होता है, उसे सहज क्लैब्य कहते हैं। आयुर्वेद ने मुख्य रूप से नपुंसकता के ये सात कारण बताए हैं। सहज और शिराच्छेदजन्य क्लैब्यता असाध्य यानी लाइलाज और बाकी पांचों प्रकार की नपुंसकता साध्य यानी इलाज द्वारा ठीक की जा सकने वाली है।
इस प्रकार की हास्यास्पद स्थिति से बचने व बीमारी का इलाज करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक उपचार यहां दिए जा रहे हैं-
(1) नपुंसकता नष्ट करने के लिए जायफल, लौंग, कपूर और काली मिर्च 40-40 ग्राम, मकरध्वज 5 ग्राम, केसर 1 ग्राम सबको बारीक कूट-पीसकर खरल करके पान के रस के साथ घुटाई करें और आधा-आध ग्राम की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। रात को सोते समय दो चम्मच या एक चम्मच मक्खन के साथ एक गोली खाकर ऊपर से एक गिलास मीठा कुनकुना गर्म दूध पिएं, जब शाम का भोजन किए हुए दो-ढाई घंटे हो चुके हों। यह बहुत ही
 बलवीर्यवर्द्धक नुस्खा है।
(2) असगन्ध 100 ग्राम, गिलोय 50 ग्राम और गिलोयसत 10 ग्राम तीनों को कूट-पीसकर मिला लें। आधा चम्मच चूर्ण, आधा चम्मच शुद्ध घी और दो चम्मच शहद मिलाकर चाट लें और ऊपर से मिश्री मिला ठंडा किया हुआ दूध पिएं। शीतकाल के दिनों में कम से कम 60 दिन सुबह-शाम यह नुस्खा सेवन करना चाहिए।
(3) सफेद मुसली, गोखरू बड़ा, तालमखाना और तावरी 50-50 ग्राम सबको कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें और पिसी हुई मिश्री 100 ग्राम लेकर सबको मिला लें। सुबह-शाम इस चूर्ण को 1-1 चम्मच मात्रा में मीठे कुनकुने गर्म दूध के साथ सेवन करें। यह नुस्खा नपुंसकता, ध्वजभंग, शुक्रमेह, शुक्र की उष्णता व पतलापन, पेशाब की रुकावट और जलन आदि व्याधियां नष्ट कर शरीर को सशक्त बनाने और पौरुष बल की वृद्धि करने में
 सफल सिद्ध हुआ है।
(4) बड़े गोखरू, तालमखाना, शतावरी, कौंच के छिलकेरहित बीज, नागबला और अतिबला सब 50-50 ग्राम और मिश्री 150 ग्राम, सभी को कूट-पीसकर अच्छा महीन चूर्ण कर लें। सुबह-शाम 1-1 चम्मच चूर्ण फांककर ऊपर से कुनकुना मीठा दूध पिएं। यह नुस्खा बिना कोई हानि किए नपुंसकता को नष्ट करने वाला और पर्याप्त यौन शक्ति प्रदान करने वाला आयुर्वेदिक टॉनिक है। नियमों का पालन कर कम से कम 60 दिन इस नुस्खे का नियमित रूप
 से सेवन करें और स्वयं परिणाम देख लें। यह परीक्षित और सफल सिद्ध नुस्खा है। 
स्त्री बन्ध्यत्व का संभव है इलाज 
आयुर्वेद ने महिलाओं में 20 प्रकार के योनि रोग बताए हैं, जिनमें से कोई भी रोग स्त्री के बाँझपन का कारण हो सकता है। यूँ तो बन्ध्यत्व के कई कारण हो सकते हैं पर मुख्यतः स्त्री बाँझपन तीन प्रकार का होता है-
पहला- आदि बन्ध्यत्व यानी जो स्त्री पूरे जीवन में कभी गर्भ धारण ही न करे, इसे प्राइमरी स्टेरेलिटी कहते हैं।
दूसरा- काक बन्ध्यत्व यानी एक संतान को जन्म देने के बाद किसी भी कारण के पैदा होने से फिर गर्भ धारण न करना। एक संतान हो जाने के बाद स्त्री को बाँझ नहीं कहा जा सकता अतः ऐसी स्त्री को काक बन्ध्त्व यानी वन चाइल्ड स्टेरेलिटी कहते हैं।
तीसरा- गर्भस्रावण बन्ध्यत्व यानी गर्भ तो धारण कर ले पर गर्भकाल पूरा होने से पहले ही गर्भस्राव या गर्भपात हो जाए। इसे रिलेटिव स्टेरिलिटी कहते हैं।
इसके अलावा स्त्री के प्रजनन अंग का आंशिक या पूर्णतः विकसित न होना यानी योनि या गर्भाशय का अभाव, डिंबवाहिनी यानी फेलोपियन ट्यूब में दोष होना, पुरुष शुक्राणुहीनता के कारण गर्भ धारण न कर पाना, श्वेत प्रदर, गर्भाशय ग्रीवा शोथ, योनि शोथ, टीबी आदि कारणों से योनिगत स्राव क्षारीय हो जाता है, जिसके संपर्क में आने पर शुक्राणु नष्ट हो जाते हैं व गर्भ नहीं ठहर पाता।
इस प्रकार बन्ध्यत्व को दो भागों में बाँटा जा सकता है, एक तो पूर्ण रूप से बन्ध्यत्व होना, जिसका कोई इलाज न हो सके और दूसरा अपूर्ण बन्ध्यत्व होना, जिसे उचित चिकित्सा द्वारा दूर किया जा सके। किसी होम्योपैथिक चिकित्सक से सलाह लें या निम्नलिखित दवाई का प्रयोग करें-
सीपिया-30 : जरायु से संबंधित रोगों व बन्ध्यत्व के लिए यह मुख्य औषधि है। इसके लिए सीपिया-30 शक्ति की गोली सुबह-शाम लाभ न होने तक चूसकर लेना चाहिए।
कोनियम मेक : सिर को दाएँ-बाएँ हिलाने से चक्कर आ जाना इसका मुख्य लक्षण है। बाँझ स्त्री में यह लक्षण होना ही इस दवा को चुन लेने के लिए काफी है। डिम्ब कोश की क्षीणता के कारण गर्भ स्थापित न होता हो तो कोनियम मेक का सेवन लाभ करता है। कोनियम मेक सिर्फ 3 शक्ति में सुबह-शाम चूसकर सेवन करना चाहिए।
प्लेटिना 6 एक्स: अत्यंत संवेदनशील और भावुक स्वभाव होना, जननांग को छूते ही स्त्री का शरीर ऐंठने, मचलने लगे, अत्यंत कामुक प्रकृति, हिस्टीरियाई रोग के लक्षण होना, मासिक धर्म अनियमित हो, तीव्र कामवासना की प्रवृत्ति हो तो प्लेटिनम या प्लेटिना 6 एक्स शक्ति में सुबह-शाम चूसकर लेना चाहिए।
थ्लेस्पी बर्सा पेस्टोरिस : ऋतुकाल के अलावा समय में रक्त स्राव होना, अधिक होना, दाग धोने पर भी न मिटना, स्राव के समय दर्द होना आदि लक्षणों वाली बन्ध्या स्त्री को थ्लेस्पी बर्सा पेस्टोरिस का मूल अर्क (मदर टिंचर) सुबह- शाम दो चम्मच पानी में 4-5 बूँद टपकाकर लेने से लाभ होता है व गर्भ स्थापित हो जाता है।
पल्सेटिला : यह महिलाओं की खास दवा है। सीपिया और कैल्केरिया कार्ब की तरह यह दवा स्त्री के यौनांग पर विशेष प्रभाव डालती है। ये तीन दवाएँ स्त्री शरीर के हारमोन्स को सक्रिय कर देती हैं। पहले पल्सेटिला की एक खुराक 3 एक्स शक्ति में देकर आधा घंटे बाद पल्सेटिला 30 एक्स शक्ति में देना चाहिए। इस तरह दिन में 3-3 खुराक देना चाहिए, इसी के साथ सप्ताह में दो बार सीपिया 200 शक्ति में और
 कैल्केरिया कार्ब 200 शक्ति में दिन में एक बार देना चाहिए। इस प्रयोग से दो या तीन माह में बन्ध्यत्व दूर हो जाता है।
औरम म्यूर नैट्रोनेटम : इसे स्त्री बाँझपन को दूर करने की विशिष्ट दवा माना जाता है। गर्भाशय के दोषों को दूर कर यह दवा गर्भ स्थापना होने की स्थिति बना देती है। गर्भाशय में सूजन हो, स्थानभ्रंण यानी प्रोलेप्स ऑफ यूटेरस की स्थिति हो, योनि मार्ग में जख्म हो या छाले हों तो नैट्रोनेटम 2 एक्स या 3 एक्स शक्ति में सुबह-शाम सेवन करना चाहिए। इसे 30 शक्ति में भी लिया जा सकता है।
यहाँ होम्योपैथिक तरीके से इलाज का तरीका व दवाई के नाम बताए गए हैं। होम्योपैथिक चिकित्सा इस विषय विशेष में अच्छा दखल रखती है व बीमारी के उपचार में सहायता करती है। लेकिन दवाओं के इस्तेमाल से पूर्व योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक की सलाह अवश्य लें। 
गर्भावस्था और सेक्स की समस्या
गर्भावस्था में सेक्स करना ठीक है या नहीं, क्या इससे गर्भस्थ शिशु को कोई हानि हो सकती है या गर्भवती स्त्री को कोई तकलीफ। आदि प्रकार के सवाल स्त्री तथा पुरुषों के मन में उठते रहते हैं। जैसे-जैसे गर्भावस्था बढ़ती जाती है, स्त्री की परेशानी भी बढ़ती जाती है। सेक्स के सामान्य तरीके अपनाना इसलिए कठिन हो जाता है, क्योंकि गर्भवती महिला के उदर पर किसी प्रकार का दबाव उसके तथा
 भ्रूण दोनों के लिए कष्टदायी तथा नुकसानदेह हो सकता है।
वैसे छठे या सातवें माह तक की गर्भावस्था में सेक्स किया जा सकता है, लेकिन विशेष सावधानी के साथ। इसके लिए डॉक्टर की सलाह पर विशेष प्रकार के आसन अपनाए जा सकते हैं। आसन इस प्रकार होना चाहिए, जिससे स्त्री का पेट न दबे, गर्भ पर दबाव न पड़े तथा पीड़ा का अनुभव न हो।
आयुर्वेद के अनुसार इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि गर्भ के सातवें मास तक सेक्स किया जा सकता है, लेकिन सावधानीपूर्वक। आयुर्वेद का मानना है कि यदि गर्भ में लड़का है तो स्त्री की संभोग की इच्छा नहीं होगी या कम होगी। साथ ही यदि गर्भ में लड़की है तो स्त्री को संभोग की इच्छा बनी रहेगी।
कुछ महिलाएँ इस काल में सेक्स का आनंद नहीं उठा पातीं। कभी-कभी वे इतनी थकान महसूस करती हैं कि उनके भीतर एक आनंदपूर्ण संभोग का मजा उठाने की ऊर्जा और उत्साह नहीं रहता। कई बार रक्त स्राव या योनि में पीड़ा होने के कारण भी वे सेक्स से मना करती हैं। डॉक्टर भी ऐसी स्थिति में पति-पत्नी को सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
पहली बार गर्भवती हुई कई महिलाएँ शुरू के सप्ताहों में सेक्स में जरा भी रुचि नहीं लेती हैं। वहीं दो-तीन माह बीतने पर वे ही महिलाएँ गर्भावस्था में भी सेक्स का भरपूर आनंद उठाती हैं, उनकी प्रतिदिन सेक्स करने की इच्छा होती है।
अध्ययनों से यह पता चला है कि पहली बार गर्भवती हुई महिला की गर्भावस्था के शुरू के सप्ताहों में सेक्स में कम रुचि होती है, जबकि दूसरी या इससे अधिक बार गर्भवती होने वाली महिलाएँ अपनी यौन भावना में कोई विशेष अंतर नहीं पाती हैं।
अध्ययनों से यह भी तथ्य सामने आया है कि कुछ महिलाएँ मानती हैं कि मतली, वमन तथा अवसाद का समय बीत जाने पर उन्हें सेक्स में पहले की तुलना में अधिक आनंद प्राप्त होता है।
पुरुषों को अपनी गर्भवती पत्नियों के समीप रहकर उनमें बराबर रुचि लेते रहना चाहिए। अधिकांश पुरुष शुरू में बहुत ध्यान रखते हैं, लेकिन बाद में सेक्स से वंचित रहने के कारण उनकी रुचि अपनी पत्नी में कम हो जाती है।
कई लोग अपनी पत्नी की ओर से प्यार और ध्यान की कमी महसूस करते हैं और इस कारण उपेक्षा करते हैं, उन्हें सिर्फ आने वाले बच्चे के प्रति मोह रहता है, पत्नी के प्रति कम हो जाता है। वे यह सोचकर तथा कह कर अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं कि गर्भवती को तो गर्भावस्था की परेशानियों को सहन करना ही पड़ता है।
गर्भावस्था में पति-पत्नी संभोग के लिए ऐसे आसन अपना सकते हैं, जो सुविधापूर्ण और आरामदेह हों, बशर्तें डॉक्टर ने किसी आसन विशेष के लिए पूरी मनाही न की हो। पूर्व गर्भपात, गर्भावस्था की स्थिति अथवा विशिष्ट स्त्रियोचित समस्या को दृष्टिगत रखते हुए डॉक्टर संभोग से दूर रहने की सलाह भी दे सकता है।
वैसे निर्णय आप दोनों ही लें कि आपके लिए क्या ठीक है और आप कब तक अपने ऊपर संयम रख सकते हैं। गर्भावस्था में सेक्स न करना ज्यादा अच्छा रहेगा, इस पीरियड में स्त्री को जितना आराम दिया जाए व सेक्स से दूरी बनाकर रखी जाए, उतना ही अच्छा है। एक बार अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लें 
रति क्रिया के नियम
* दिन के समय कभी भी सहवास न करें, सहवास (मैथुन) हमेशा रात में ही करना चाहिए वह भी सिर्फ एक बार। हो सके तो इसमें भी 'गैप' दें।
* सूर्योदय के कुछ समय पूर्व से लेकर सूर्योदय के बाद यानी ब्रह्य मुहूर्त में किया गया सहवास स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है।
* जो लोग शाम सात बजे तक भोजन कर लेते हैं, उनको छोड़कर शेष लोगों को जो कि भोजन रात्रि 10-11 बजे तक करते हैं, सहवास आधी रात के बाद करना हितकारी है।
* शयन के ठीक पहले दूध न पिएँ , यदि दूध लेना ही है तो सोने के एक घण्टा पूर्व लें।
* स्त्री का जिस समय मासिक धर्म चला रहा हो, तब उसके साथ सहवास न करें। इन चार दिनों में कंडोम वगैरह लगाकर भी नहीं। ऐसा करना कई तरह के रोगों को दावत देना है। अप्राकृतिक मैथुन किसी भी सूरत में उचित नहीं, इससे दूर ही रहें।
* कई व्यक्ति सहवास को महज एक औपचारिकता के तौर पर लेते हैं और इस कार्य को केवल वीर्य स्खलन मानते हुए जल्द खत्म कर देते हैं। दरअसल सहवास में जल्दबाजी न तो पुरुष को ही आनंद देने वाली होती है और न ही स्त्री की संतुष्टि। लिहाजा सहवास के पूर्व विभिन्न क्रिया-कलाप एवं श्रृंगार रसपूर्ण बातों से स्त्री के 'काम' या सेक्स को पूर्ण जागृत करें, तभी सहवास का सच्चा आनंद आप पा सकते हैं और
 सहयोगी को पूर्ण संतुष्टि भी दे सकते हैं।
* कई व्यक्ति सहवास को इस हद तक जरूरी मानते हैं कि भले ही उनका सहयोगी ठंडा पड़ा हो या वह अन्य किसी कठिन परिस्थिति से गुजर रहा हो, वे सहवास करते ही हैं। यदि पति-पत्नी में से कोई भी क्रोध, चिंता, दुःख, अविश्वास आदि किसी भी मानसिक समस्या से गुजर रहा हो, तो सहवास करना उचित नहीं है। यानी सहवास उसी समय परम आनंददायक होता है, जब पति-पत्नी दोनों पूर्ण प्रसन्न चित्त हों
 जो लोग शाम सात बजे तक भोजन कर लेते हैं, उनको छोड़कर शेष लोगों को जो कि भोजन रात्रि 10-11 बजे तक करते हैं, सहवास आधी रात के बाद करना हितकारी है।       
अनियमित मासिक धर्म
किशोर अवस्था पार कर नवयौवन में प्रवेश करने वाली नवयुवतियों, नवविवाहिताओं व छोटे शिशुओं की माताओं को भी अनियमित मासिक धर्म की शिकायत रहती है।
यह माह में कभी दो बार या एक-डेढ़ माह में एक बार तक हो सकता है, यानी नियमित नहीं रहता, कभी ज्यादा गरम वस्तु खा ली कि मासिक शुरू हो जाता है।
यह 28 दिन की अवधि में न हो, बहुत थोड़ी मात्रा में हो, कष्ट के साथ हो तो यह अनियमित मासिक धर्म कहलाता है। उपरोक्त वर्णित तकलीफ में यह इलाज करें-
(1) दोनों वक्त आधा कप पानी में अशोकारिष्ट और दशमूलारिष्ट की 2-2 चम्मच दवा डालकर लगातार दो माह या तीन माह तक पीना चाहिए। मासिक धर्म शुरू होने से 2-3 दिन पहले से सुबह दशमूल का काड़ा बनाकर खाली पेट पीना शुरू कर, मासिक स्राव शुरू हो तब तक सेवन करना चाहिए।
(2) श्वेत प्रदर और अनियमित मासिक धर्म की चिकित्सा 4-5 माह तक इस प्रकार करें- भोजन के बाद आधा कप पानी में दशमूलारिष्ट, अशोकारिष्ट और टॉनिक एफ-22 तीनों दवा को 2-2 बड़े चम्मच डालकर दोनों वक्त पीना चाहिए।
(3) 20 ग्राम गन्ने का सिरका रोज रात को सोने से पहले पीने से खुलकर व साफ माहवारी आती है।
(4) अमलतास का गूदा 4 ग्राम, नीम की छाल तथा सोंठ 3-3 ग्राम लेकर कुचल लें। 250 ग्राम पानी में 10 ग्राम गुड़ सहित तीनों सामग्री डाल दें व पानी चौथाई रहने तक उबालें। मासिक की तारीख शुरू होते ही इस काढ़े को सिर्फ एक बार पिएँ । इससे मासिक खुलकर आएगा तथा पीड़ा यदि हो तो दूर होगी।
(5) आयुर्वेदिक दुकान पर मिलने वाली चन्द्रप्रभा वटी की 5-5 गोलियाँ सुबह-शाम कुमारी आसव के साथ कुछ दिनों तक सेवन करने से शरीर में लोहे की कमी दूर होती है, व मासिक नियमित होता है।
दोनों वक्त शौच के लिए अवश्य जाना चाहिए। तले हुए तेज मिर्च-मसालेदार, उष्ण प्रकृति के और खट्टे पदार्थ तथा खटाई का सेवन नहीं करना चाहिए।   
श्वेत प्रदर/ल्यूकोरिया       भारतीय महिलाओं में यह आम समस्या प्रायः बिना चिकित्सा के ही रह जाती है। सबसे बुरी बात यह है कि इसे महिलाएँ अत्यंत सामान्य रूप से लेकर ध्यान नहीं देती, छुपा लेती हैं जिससे कभी-कभी गर्भाशयगत कैंसर होने की भी संभावना रहती है।
प्रारंभ में ध्यान देकर चिकित्सा की जाए तो निश्चित ठीक होता है किन्तु उपेक्षा करने पर, काफी देर से चिकित्सा करने पर गंभीर या असाध्य भी हो सकता है। अधिकांश मामलों में यह देखने में आया है कि इस बीमारी को योग्य चिकित्सक से इलाज कराने के बजाए लोग नीम हकीमों के पास जाना पसंद करते हैं।
योनि मार्ग से सफेद, चिपचिपा गाढ़ा स्राव होना आज मध्य उम्र की महिलाओं की एक सामान्य समस्या हो गई है। सामान्य भाषा में इसे सफेद पानी जाना, श्वेत प्रदर या ल्यूकोरिया कहा जाता है। आयुर्वेद में काश्यप संहिता में वर्णित कौमार भृत्य (बालरोग) के अंतर्गत बीस प्रकार की योनिगत व्याधियों का वर्णन है जिसमें से एक 'पिच्छिला योनि' के लक्षण पूर्णतः ल्यूकोरिया से मिलते हैं। प्रदर या
 योनिगत स्राव दो प्रकार का है। एक सफेद पानी जाना दूसरा योनि मार्ग से माहवारी के रूप में अत्यधिक- अधिक दिनों तक (4-5 दिन से ज्यादा) या बार-बार रक्त स्राव होना रक्तप्रदर है।
श्वेत प्रदर वास्तव में एक बीमारी न होकर किसी अन्य योनिगत गर्भाशयगत व्याधि का लक्षण है या सामान्यतः प्रजनन अंगों में सूजन का बोधक है। सफेद पानी के साथ सबसे बुरी बात यह है कि इसे महिलाएँ अत्यंत सामान्य रूप से लेकर ध्यान नहीं देती छुपा लेती हैं जिससे कभी-कभी गर्भाशयगत कैंसर होने की भी संभावना रहती है। 
  योनि मार्ग से सफेद, चिपचिपा गाढ़ा स्राव होना आज मध्य उम्र की महिलाओं की एक सामान्य समस्या हो गई है। सामान्य भाषा में इसे सफेद पानी जाना, श्वेत प्रदर या ल्यूकोरिया कहा जाता है। आयुर्वेद में काश्यप संहिता में बीस प्रकार की योनिगत व्याधियों का वर्णन है।          
कैंसर का एक सर्व स्वीकृत कारण किसी भी अंग पर लंबे समय तक घर्षण होना है। अतः श्वेत प्रदर है तो एक सामान्य लक्षण है जिसकी ओर प्रारंभ में ध्यान देकर चिकित्सा की जाए तो निश्चित ठीक होता है किन्तु उपेक्षा करने पर, काफी देर से चिकित्सा करने पर गंभीर या असाध्य भी हो सकता है।
चिकित्सा क्या है? यदि सफेद पानी के कारणों को देखें तो इसमें महिला का शर्म के आवरण में लिपटा होकर अपनी तकलीफ को अपने पति से भी छुपाना है। श्वेत प्रदर या सफेद पानी का मुख्य कारण अस्वच्छता है। जिसे निम्नानुसार दूर किया जा सकता है।
* योनि स्थल की पर्याप्त सफाई रखना। 
* बालों को साफ करते रहना : चूँकि योनि- मल एवं मूत्र मार्ग पास-पास होते हैं, मल एवं मूत्र में विभिन्न कीटाणु होते हैं, बालों की उपस्थिति में कीटाणु बालों के मूल में स्थित होकर योनि मार्ग में प्रविष्ट होकर अनेक योनि गर्भाशयगत व्याधियों को उत्पन्न कर सकते हैं। बालों की जड़ों पर ठीक प्रकार से सफाई नहीं हो पाती अतः समय-समय पर बालों को हेयर रिमूवर से साफ करना, ब्लेड से साफ करना या
 कैंची से काटना चाहिए।
* प्रत्येक बार मल मूत्र त्याग के पश्चात अच्छी तरह से संपूर्ण अंग को साबून से धोना।
* मैथुन के पश्चात अवश्य ही साबुन से सफाई करना चाहिए।
उपरोक्त सामान्य सावधानियों से ही श्वेत प्रदर की उत्पत्ति को रोका जा सकता है।
कारणों के दृष्टिकोण से निम्न अत्यधिक घर्षण जन्य कारणों के प्रति भी महिलाओं को सतर्क रहना चाहिए।
* अत्यधिक मैथुन- घर्षण का प्रमुख कारण है।
* ज्यादा प्रसव होना
* बार-बार गर्भपात कराना : यह सफेद पानी का एक प्रमुख कारण है। अतः महिलाओं को अनचाहे गर्भ की स्थापना के प्रति सतर्क रहते हुए गर्भ निरोधक उपायों का प्रयोग (कंडोम, कापर टी, मुँह से खाने वाली गोलियाँ) अवश्य करना चाहिए। साथ ही एक या दो बच्चों के बाद अपना या अपने पति का नसबंदी आपरेशन कराना चाहिए।
सामान्य लक्षण
* योनि स्थल पर खुजली होना
* कमर दर्द होना
* चक्कर आना
* कमजोरी बनी रहना
चिकित्सा
* ऊपर वर्णित कारणों को दूर करना- श्रेष्ठ चिकित्सा है।
* स्फटिका या फिटकरी को तवे पर गर्म कर पीसकर रखें, इससे सुबह शाम योनि स्थल की सफाई करें। फिटकरी एक श्रेष्ठ जीवाणु नाशक सस्ती औषधि है, सर्वसुलभ है।
* मांजूफल चूर्ण 50 ग्राम तथा टंकण क्षार- 25 ग्राम लेकर- 50 मात्रा कर या 50 पुड़िया बनाकर सुबह शाम शहद के साथ चाटना।
* अशोकारिष्ट 4-4 चम्मच सुबह-शाम समान पानी से भोजन के बाद लें।
* सुपारी पाक 1-1 चम्मच-सुबह शाम दूध से सेवन करने से सफेद पानी में लाभ होता है। 
स्त्री-पुरुष रोगों की दवाएँ
आयुर्वेदिक दवाओं की जानकारी में हम अभी तक विभिन्न रोगों की दवाएँ बता चुके हैं। इसी कड़ी के अंतर्गत स्त्री संबंधी तथा पुरुष संबंधी रोगों में उपयोगी दवाओं की जानकारी दे रहे हैं।
स्त्री रोगों की दवाएँ
बंध्यत्व : फल घृत, वंग भस्म, शुद्ध शिलाजीत, अशोकारिष्ट।
प्रदर (लाल, पीला, सफेद, पानी जाना) : अशोकारिष्ट, फेमीकेयर सीरप, प्रदरहर वटी, पत्रांगासव, लोध्रासव, प्रदरांतक लौह, पुष्पानुग चूर्ण।
रक्त प्रदर : रक्त स्तम्भक, कामदुधा, रस मौ.यु, कहरवा पिष्टी, बोलबद्ध रस, प्रवाल पिष्टी, अशोकारिष्ट, लोध्रासव, पुष्पानुग चूर्ण, दुग्ध पाषण भस्म।
कष्टार्तव (मासिक धर्म के समय दर्द) पेडू का दर्द : ऋतुरूजाहर, रजः प्रवर्तनी वटी, अशोकारिष्ट, लोध्रासव, कुमारी आसव, पुष्पावरोधग्न चूर्ण।
गर्भवती स्त्रियों के लिए उपयोगी : फल घृत, बादाम तेल, मधुमालिनी वसंत, दशमूराशिष्ट पाल रस, लवंगादि चूर्ण।
प्रसव के पश्चात उपयोगी : दशमूलारिष्ट, सुपारी पाक, जीरकाद्यरिष्ट दशमूल काढ़ा।
पुरुष रोगों की दवाएँ
शुक्रदोष, धातुक्षीणता, नपुंसकता : सिद्ध मकरध्वज, पुष्पधन्वा रस, त्रिवंग भस्म, बंग भस्म, स्वर्णराज बंगेश्वर, शतावरी घृत, अश्वगंधारिष्ट, शतावरी चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण।
स्वप्न दोष (सोते में धातु जाना आदि) : चन्द्रप्रभा वटी, स्वप्न, प्रमेहरी, त्रिबंग भस्म, शुद्ध शिलाजीत, अश्वगंधारिष्ट। साथ में पेट साफ रखने हेतु स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण लेना चाहिए।
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ना (बार-बार पेशाब जाना व तकलीफ से थोड़ा-थोड़ा होना) : चन्द्रप्रभा वटी, गोक्षुरादि गूगल, शुद्ध शिलाजीत।
धातु पौष्टिक व काम शक्ति वर्द्धक : कामिनी विद्रावणरस, सिद्ध मकरध्वज, शक्रवल्लभ रस, पुष्पधन्वा रस, बंगेश्वर रस, मूसली पाक, दशमूलराष्टि, गोक्षुरादि चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण।       
वीर्य स्तंभन वटी
युवा अथवा प्रौढ़ आयु के विवाहित पुरुष जो यौन शक्ति में कमी का अनुभव करते हैं, स्तंभन शक्ति न रखते हों, यौनांग में शिथिलता व उत्साहहीनता का अनुभव करते हों, ऐसे पुरुष मानसिक व शारीरिक रूप से स्थिर रहकर नीचे दिए जा रहे नुस्खे का प्रयोग करें।
यह नुस्खा महंगा है और धन संपन्न व्यक्ति ही इसको तैयार कर सकता है या बना बनाया बाजार से खरीद सकता है।
द्रव्य : कस्तूरी व सोने के वर्क 1-1 ग्राम, चाँदी के वर्क, इलायची, जुन्देबेदस्तर 10-10 ग्राम, नरकचूर, दरूनज अकबरी, बहमन लाल, बहमन सफेद, जटामांसी, लौंग, तेजपान 6-6 ग्राम, पीपल और सौंठ 3-3 ग्राम।
विधि : जुन्देबेदस्तर को शहद में घोंट लें फिर क्रमशः तीनों वर्क और शेष द्रव्यों का कुटा-पिसा महीन चूर्ण मिला लें तथा शहद मिलाते हुए तीन घंटे तक खरल में घुटाई करें, फिर आधा-आधा ग्राम की गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। सुबह-शाम 2-2 गोली शहद के साथ लें व ऊपर से दूध पी लें।
लाभ : यह वटी वाजीकारक नुस्खों में अति उत्तम और संतोषप्रद लाभ करने वाली निरापद औषधि है।
* यह पाचन क्रिया को बलवान बनाकर जहाँ शरीर को रस रक्त आदि सातों धातुओं को पुष्ट करने की क्षमता प्रदान कर शरीर को पुष्ट व शक्तिशाली बनाती है, वहीं यौनांग को भी शक्ति, स्फूर्ति व कठोरता प्रदान कर शीघ्रपतन, शिथिलता व निर्बलता को नष्ट कर यौन शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करती है।
* विवाहित पुरुषों को अपनी असमर्थता दूर कर उचित पौरुष बल प्राप्त करने के लिए उचित आहार-विहार और संयम का पालन कर कम से कम 40 दिन तक वीर्यशोधन वटी 1-1 गोली के साथ इस वीर्य स्तंभन वटी का सेवन करना चाहिए। ये दोनों दवाएँ बाजार में बनी बनाई मिलती है 
योनि की खुजली, योनि दाह
कई कारणों से स्त्रियों की योनि में खुजली (कण्डु) होने लगती है। खुजली होने पर युवती को बार-बार अपना हाथ वहाँ ले जाना पड़ता है, यह अशोभनीय लगता है।
योनि में खुजली होने के कई कारण हो सकते हैं, इन कारणों में संक्रमण (इन्फेक्शन) होना, गन्दगी यानी रोजाना सफाई-धुलाई न करने से अस्वच्छता का होना, फिरंग, पूयमेह या उपदंश आदि यौन रोग होना, रक्त विकार होना, हमेशा कब्ज रहना और पति के यौनांग में कोई इन्फेक्शन होना, जिस कारण पति सहवास के समय सम्पर्क होने से योनि में भी इन्फेक्शन होना आदि प्रमुख कारण हैं।
इस व्याधि में योनि मार्ग पर लाल दाने और दाह भी हो सकता है। यह व्याधि आमतौर पर स्त्रियों में पाई जा रही है।
चिकित्सा
(1) नीम, हरड़, बहेड़ा, आँवला और जमाल घोटा की जड़ 100-100 ग्राम लेकर जौकुट कर लें और बर्नी में भरकर रख लें। एक गिलास पानी में चार चम्मच जौकुट चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी एक कप बचे, तब उतारकर कपड़े से छान लें। इस पानी से योनि को धोएँ या इस पानी में कपड़ा या साफ रूई भिगोकर योनि में रखकर 1-2 घण्टे लेटे रहें तो भी लाभ होता है। यह प्रयोग रात को सोते समय भी कर सकते हैं। प्रसिद्ध आयुर्वेदिक
 'धातक्यादि तेल' का फाहा सोते समय योनि में रखने से शीघ्र लाभ होता है।
(2) सरसों के तेल में नमक मिलाकर योनि के खुजली वाले स्थान पर लगाएँ व कुछ समय बाद धो दें।
(3) आमलकी रसायन, शकर 50-50 ग्राम और गिलोय सत्व 25 ग्राम तीनों को मिलाकर बारीक पीस लें और महीन चूर्ण करके शीशी में भर लें। इस चूर्ण को 1-1 चम्मच दिन में तीन बार पानी के साथ लें। सुबह-शाम चन्दनादि वटी की 2-2 गोली पानी के साथ लें और रात को सोते समय धातक्यादि तेल का रूई का फाहा योनि में रखें।
(4) रात को एक कप कुनकुने दूध में 2 चम्मच केस्टर ऑइल डालकर तीन दिन तक पिएं। तीन दिन बाद शिलाजत्वादि वटी और चन्द्रप्रभा वटी नं.-1 दो-दो गोली सुबह-शाम दूध के साथ लें व 'धातक्यादि तेल' का फाहा योनि में रखे। इसके बाद सुबह त्रिफला चूर्ण 20 ग्राम को पानी में उबलकर ठंडा करें, उसमें शहद मिलाकर योनि प्रदेश की सफाई करें, फिर स्नान करते समय पानी से धोएं।
(5) नीम के पत्तों को पानी में उबालकर उसी पानी से योनि की सफाई करें। नारियल के तेल में कपूर मिलाकर योनि पर लगाने से भी खुजली दूर होती है।
(6) एक गिलास छाछ में नीबू निचोड़कर सुबह खाली पेट पिएं। 3-4 दिन यह प्रयोग करने से खुजली दूर हो जाती है।
(7) 100 ग्राम फिटकरी का बारीक चूर्ण कर लें। 5 ग्राम चूर्ण आधा लीटर गुनगुने पानी में मिलाकर उससे योनि साफ करें, ऐसा दिन में 3-4 बार करें, आराम मिलेगा।
(8) गूलर के पेड़ की कुछ पत्तियां आधा लीटर पानी में उबालें, उसमें एक ग्राम सुहागा मिलाकर पिचकारी की तरह योनि में छोड़ें, खुजली में आराम मिलेगा।
(9) एरंड के तेल का फाहा बनाकर योनि में रखने से योनि दर्द, सूजन व खुजली में आराम मिलता है।
(10) नीम के फल का बीज और एरंड के बीजों को नीम के रस में पीसकर योनि पर लेप करने से सूजन, दर्द दूर होता है। यह प्रयोग तीन दिन तक करना चाहिए।
(11) अफीम के डोडे का काढ़ा बनाएं, इसे प्रसव के बाद होने वाले योनिशूल या गर्भाशय पीड़ा में प्रसूता को पिलाने से आराम मिलता है। नारियल की गिरि खिलाने से प्रसूति बाद का दर्द दूर होता है।
(12) प्रसव के समय योनि में क्षत (घाव या छिलन) होने पर लोध्र का महीन पिसा चूर्ण शहद में मिलाकर योनि के अन्दर लगाने से क्षत ठीक होते हैं।
पुष्यानुग चूर्ण : केसर के स्थान पर नागकेसर डालकर बनाया गया योग पुष्यानुग चूर्ण नंबर 2 महिलाओं के गर्भाशय एवं योनि प्रदेश से संबंधित व्याधियों के लिए अत्यंत लाभकारी है। इस योग की विशेषता यह है कि यह अकेला ही सभी प्रकार के प्रदर रोगों के अलावा गर्भाशय शोथ, गर्भाशयभ्रंश, योनिक्षत आदि कई रोगों को दूर करता है। यह इसी नाम से बना बनाया बाजार में मिलता है 
वक्षस्थल को दें सही आकार
आयुर्वेदिक उपचार : अरंडी के पत्ते, घीग्वार (ग्वारपाठा) की जड़, इन्द्रायन की जड़, गोरखमुंडी एक छोटी कटोरी, सब 50-50 ग्राम। पीपल वृक्ष की अन्तरछाल, केले का पंचांग (फूल, पत्ते, तना, फल व जड़) , सहिजन के पत्ते, अनार की जड़ और अनार के छिलके, खम्भारी की अन्तरछाल, कूठ और कनेर की जड़, सब 10-10 ग्राम। सरसों व तिल का तेल 250-250 मिलीग्राम तथा शुद्ध कपूर 15 ग्राम। यह सभी आयुर्वेद औषधि की दुकान पर मिल
 जाएगा।
निर्माण विधि : सब द्रव्यों को मोटा-मोटा कूट-पीसकर 5 लीटर पानी में डालकर उबालें। जब पानी सवा लीटर बचे तब उतार लें। इसमें सरसों व तिल का तेल डालकर फिर से आग पर रखकर उबालें। जब पानी जल जाए और सिर्फ तेल बचे, तब उतारकर ठंडा कर लें, इसमें शुद्ध कपूर मिलाकर अच्छी तरह मिला लें। बस दवा तैयार है। असामान्य व अविकसित स्तन
प्रयोग विधि : इस तेल को नहाने से आधा घंटा पूर्व और रात को सोते समय स्तनों पर लगाकर हलके-हलके मालिश करें।
लाभ : इस तेल के नियमित प्रयोग से 2-3 माह में स्तनों का उचित विकास हो जाता है और वे पुष्ट और सुडौल हो जाते हैं। ऐसी युवतियों को तंग चोली नहीं पहननी चाहिए और सोते समय चोली पहनकर नहीं सोना चाहिए। इस तेल का प्रयोग लाभ न होने तक करना चाहिए।
* फिटकरी 20 ग्राम, गैलिक एसिड 30 ग्राम, एसिड आफ लेड 30 ग्राम, तीनों को थोड़े से पानी में घोलकर स्तनों पर लेप करें और एक घंटे बाद शीतल जल से धो डालें। लगातार एक माह तक यदि यह प्रयोग किया गया तो 45 वर्ष की नारी के स्तन भी नवयौवना के स्तनों के समान पुष्ट हो जाएंगे।
* गम्भारी की छाल 100 ग्राम व अनार के छिलके सुखाकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। दोनों चूर्ण 1-1 चम्मच लेकर जैतून के इतने तेल में मिलाएं कि लेप गाढ़ा बन जाए। इस लेप को स्तनों पर लगाकर अंगुलियों से हलकी-हलकी मालिश करें। आधा घंटे बाद कुनकुने गर्म पानी से धो डालें। जो भी परिणाम मिले, उसकी सूचना कृपया हमें जरूर दें।
* छोटी कटेरी नामक वनस्पति की जड़ व अनार की जड़ को पानी के साथ घिसकर गाढ़ा लेप करें। इस लेप को स्तनों पर लगाने से कुछ दिनों में स्तनों का ढीलापन दूर हो जाता है।
* बरगद के पेड़ की जटा के बारीक नरम रेशों को पीसकर स्त्रियां अपने स्तनों पर लेप करें तो स्तनों का ढीलापन दूर होता है और कठोरता आती है।
* इन्ही के साथ सर्वोत्तम यह भी रहेगा कि रात को सोने से पहले किसी भी तेल की 10 मिनट तक मालिश करें। या तो स्वयं करें या अपने पति से कराएं, मालिश के दिनों में गेप न करें, रेगुलर करें व दो माह बाद चमत्कार देखें। स्तनों की मालिश हमेशा नीचे से ऊपर ही करें।
* स्तनों की शिथिलता दूर करने के लिए एरण्ड के पत्तों को सिरके में पीसकर स्तनों पर गाढ़ा लेप करने से कुछ ही दिनों में स्तनों का ढीलापन दूर हो जाता है। कुछ व्यायाम भी हैं, जो वक्षस्थल के सौन्दर्य और आकार को बनाए रखते हैं। 
असामान्य व अविकसित स्तन
महिलाओं के शरीर में स्तनों का विशिष्ट स्थान है, इस दृष्टि से इनकी देखभाल और सुरक्षा करना बहुत जरूरी है। आज हर युवती चाहती है कि उसके स्तन उन्नत, सुडौल व विकसित दिखें। चेहरे के अलावा स्त्रियों के उन्नत स्तन ही आकर्षण का केन्द्र होते हैं।
जब किसी कारण किसी युवती के वक्षस्थल का समुचित विकास नहीं हो पाता तो वह चिंतित और दुःखी हो उठती है, प्रायः हमउम्र सहेलियों एवं परिवार की महिलाओं के सामने लज्जा का अनुभव करती है। उसे यह भी संकोच और भय होता है कि विवाह के बाद पति के सामने उसकी क्या स्थिति होगी।
शारीरिक सौंदर्य एवं देहयष्टि की दृष्टि से स्त्री शरीर में सुन्दर, स्वस्थ और सुडौल स्तन शारीरिक आकर्षण के प्रमुख अंग तो हैं ही, नवजात शिशु को पोषक, शुद्ध और स्वास्थ्यवर्द्धक आहार उपलब्ध कराने वाले एकमात्र अंग भी हैं। कुमारी अथवा विवाहित युवतियों के लिए इन अंगों का स्वस्थ, पुष्ट और सुडौल होना आवश्यक माना जाता है।
स्त्री के शरीर में पुष्ट, उन्नत और सुडौल स्तन जहां उसके अच्छे स्वास्थ्य के सूचक होते हैं, वहीं नारित्व की गरिमा और सौन्दर्य वृद्धि करने वाले प्रमुख अंग भी होते हैं। अविकसित, सूखे हुए और छोटे स्तन भद्दे लगते हैं, वहीं ज्यादा बड़े-ढीले और बेडौल स्तन भी स्त्री के व्यक्तित्व और सौन्दर्य को नष्ट कर देते हैं। स्तनों का सुडौल, पुष्ट और उन्नत रहना स्त्री के अच्छे स्वास्थ्य और
 स्वस्थ शरीर पर ही निर्भर है। घरेलू कामकाज और खासकर हाथों से परिश्रम करने के काम अवश्य करना चाहिए।
स्तनों का उचित विकास न होने के पीछे शारीरिक स्थिति भी एक कारण होती है। यदि शरीर बहुत दुबला-पतला हो, गर्भाशय में विकार हो, मासिक धर्म अनियमित हो तो युवती के स्तन अविकसित और छोटे आकार वाले रहेंगे, पुष्ट और सुडौल नही हो पाएंगे। एक कारण मानसिक भी होता है, लगातार चिंता, तनाव, शोक, भय और कुंठा से ग्रस्त रहने वाली, स्वभाव से निराश, नीरस और उदासीन प्रवृत्ति की युवती के भी स्तन
 अविकसित ही रहेंगे।
यदि वंशानुगत शारीरिक दुबलापन न हो तो उचित आहार और हलके व्यायाम से शरीर को पुष्ट और सुडौल बनाया जा सकता है। जब पूरा शरीर हृष्ट-पुष्ट हो जाएगा तो स्तन भी विकसित और पुष्ट हो जाएंगे। शरीर बहुत ज्यादा दुबला-पतला, चेहरा पिचका हुआ और आंखें धंसी हुई होंगी तो यही हालत स्तनों की भी होता स्वाभाविक है।
इसके अलावा युवतियों की एक समस्या और है- बेडौल, ज्यादा बड़े आकार के व शिथिल स्तन होना। इसके कारण हैं शरीर का मोटा होना, चर्बी ज्यादा होना, ज्यादा मात्रा में भोजन करना, मीठे व गरिष्ठ पदार्थों का सेवन, सुबह ज्यादा देर तक सोना, दिन में अधिक देर तक सोना आदि। मानसिक कारणों में एक कारण और है- कामुक विचारों का चिंतन करना, अश्लील साहित्य या चित्रों का अवलोकन, हमउम्र सहेलियों से
 कामुकतापूर्ण बातें, किसी बहाने से अपने स्तन सहलवाना या मर्दन करवाना, किसी बहाने से स्तनों को छूने के पुरुषों को ज्यादा मौके देना आदि।
आयुर्वेद ने स्तनों की उत्तमता को यूं कहा है- स्तन अधिक ऊंचे न हों, अधिक लम्बे न हों, अधिक कृश (मांसरहित) न हों, अधिक मोटे न हों। स्तनों के चुचुक (निप्पल) उचित रूप से ऊंचे उठे हुए हों, ताकि बच्चा भलीभांति मुंह में लेकर सुखपूर्वक दूध पी सके, ऐसे स्तन उत्तम (स्तन सम्पत्‌) माने गए हैं।
नारी शरीर में स्तनों का विकास किशोर अवस्था के शुरू होते ही, 12-13 वर्ष की आयु होते ही होने लगता है और 16 से 18 वर्ष की आयु तक इनका विकास होता रहता है। गर्भ स्थापना होने की स्थिति में इनका विकास तेजी से होता है, ताकि बालक का जन्म होते ही, उसे इनसे दूध मिल सके। स्तनों का यही प्रमुख एवं महत्वपूर्ण उपयोग है।
स्तनों की देखभाल
* कभी-कभी स्तनों में हलकी सूजन और कठोरता आ जाती है। मासिक धर्म के दिनों में प्रायः यह व्याधि हुआ करती है, जो मासिक ऋतु स्त्राव बन्द होते ही ठीक हो जाती है। ऐसी स्थिति में गर्म पानी से नैपकिन गीला करके स्तनों को सेकना चाहिए।
* गर्भावस्था के दिनों में स्तनों को भली प्रकार धोना, अच्छे साबुन का प्रयोग करना, चुचुकों को साफ रखना यानी चुचुक बैठे हुए और ढीले हों तो उन्हें आहिस्ता से अंगुलियों से पकड़कर खींचना व मालिश द्वारा उन्नत व पर्याप्त उठे हुए बनाना चाहिए, ताकि नवजात शिशु के मुंह में भलीभांति दिए जा सकें। यदि हाथों के सहयोग से यह सम्भव न हो सके तो 'ब्रेस्ट पम्प' के प्रयोग से चुचुकों को उन्नत और
 उठे हुए बनाया जा सकता है।
* कभी-कभी चुचुकों में कटाव, शोथ या अलसर जैसी व्याधि हो जाती है, इसके लिए थोड़ा सा शुद्ध घी (गाय के दूध का) लें, सुहागा फुलाकर पीसकर इसमें मिला दें। माचिस की सींक की नोक के बराबर गंधक भी मिला लें। इन तीनों को अच्छी तरह मिलाकर मल्हम जैसा कर लें और स्तनों के चुचुक पर दिन में 3-4 बार लगाएं। ताजे मक्खन में थोड़ा सा कपूर मिलाकर लगाने से भी लाभ होता है।
सावधानियां
* किशोरावस्था में जब स्तनों का आकार बढ़ रहा हो, तब तंग अंगिया या ब्रेसरी का प्रयोग नहीं करना चाहिए, बल्कि उचित आकार की और तनिक ढीली अंगिया पहनना चाहिए। बिना अंगिया पहने नहीं रहना चाहिए वरना स्तन बेडौल और ढीले हो जाएंगे। ज्यादा तंग अंगिया पहनने से स्तनों के स्वाभाविक विकास में बाधा पड़ती है।
* भलीभांति शारीरिक परिश्रम करने वाली, हाथों से काम करने वाली किशोर युवतियों के अंग-प्रत्यंगों का उचित विकास होता है और स्तन बहुत सुडौल और पुष्ट हो जाते हैं। प्रायः घरेलू काम जैसे कपड़े धोना, छाछ बिलौना, कुएं से पानी खींचना, बर्तन मांजना, झाड़ू-पोछा लगाना और चक्की पीसना ऐसे ही व्यायाम हैं, जो स्त्री के शरीर के सब अवयवों को स्वस्थ और सुडौल रखते हैं।
* बच्चे को जन्म देते ही स्तनों का प्रयोग शुरू हो जाता है। स्तन के चुचुकों को भलीभांति अच्छे साबुन-पानी से धोकर साफ करके ही शिशु के मुंह में देना चाहिए। यदि बच्चे को दूध पिलाने के बाद भी स्तनों में दूध भरा रहे तो इस स्थिति में हाथ से या 'ब्रेस्ट पम्प' से, दूध निकाल देना चाहिए। सब प्रयत्न करने पर भी स्तन में कोई व्याधि, सूजन या पीड़ा हो तो शीघ्र ही किसी कुशल स्त्री चिकित्सक को
 दिखा देना चाहिए।
* किसी भी स्थिति में स्तनों पर आघात नहीं लगने देना चाहिए। स्तन में कभी कोई छोटी सी गांठ हो जाए जो कठोर हो और स्तन से दूध की जगह खून आने लगे तो यह स्तन के कैंसर हो सकने की चेतावनी हो सकती है। ऐसी स्थिति में तत्काल चिकित्सक से सम्पर्क करना जरूरी है। 
योनि संकोचन
पति सहवास में अति करने, अप्राकृतिक एवं असुविधापूर्ण आसनों में अति वेग के साथ सहवास करने, अति प्रसव करने और शरीर के कमजोर एवं शिथिल होने के कारण स्त्रियों का योनि मार्ग ढीला, पोला और विस्तीर्ण हो जाता है, जिससे सहवास करते समय सुख एवं आनन्द की अनुभूति नहीं होती।
ऐसी स्थिति में प्रायः पति लोग सहवास क्रिया में रुचि नहीं ले पाते और कोई-कोई पति परस्त्रीगमन की ओर उन्मुख हो जाते हैं। विलासी एवं रसिक स्वभाव के पति घर की सुन्दर नौकरानियों से ही यौन संबंध कायम कर लेते हैं। इस व्याधि को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय उपयोगी एवं कारामद सिद्ध हुए हैं।
चिकित्सा
(1) भांग को कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को 5-6 ग्राम (एक छोटा चम्मचभर) मात्रा में, एक महीन मलमल के साफ सफेद कपड़े पर रखकर छोटी सी पोटली बनाकर मजबूत धागे से बांध दें। धागा लम्बा रखें, ताकि धागे को खींचकर पोटली बाहर खींची जा सके। रात को सोते समय इस पोटली को पानी में डुबोकर गीली कर लें एवं योनि मार्ग में अन्दर तक सरकाकर रख लें और सुबह निकालकर फेंक दें। लाभ न होने तक यह
 प्रयोग जारी रखें।
(2) माजूफल का चूर्ण 100 ग्राम मोचरस का चूर्ण 50 ग्राम और लाल फिटकरी 25 ग्राम। सबको कूट-पीसकर मिलाकर रखें। पहले 20 ग्राम खड़े मूंग 3 कप पानी में खूब उबालें और बाद में छानकर इस पानी से डूश करें। एक रूई का बड़ा फाहा पानी में गीला कर निचोड़ लें और इस पर ऊपर बताया चूर्ण बुरककर यह फाहा सोते समय योनि में रखें। इन दोनों में से कोई एक प्रयोग कुछ दिन तक करने से योनि तंग और सुदृढ़ हो जाती है।
(3) शंखचालनी मुद्रा तथा मूलबंध का अभ्यास करना और मूत्र विसर्जन करते समय रोक-रोककर पेशाब करना, ये तीन उपाय योनि को चुस्त-दुरुस्त, सशक्त और संकीर्ण बनाते हैं। नियमित रूप से थोड़ी देर वज्रासन पर बैठकर शंखचालनी मुद्रा व मूलबंध लगाने का अभ्यास करना चाहिए
शंखचालनी मुद्रा के लिए वज्रासन में बैठकर योनि को इस तरह खींचे जैसे पेशाब के वेग को रोकना हो और थोड़ी देर तक खींचे हुए रखकर छोड़ दें। इस क्रिया को भी 50-60 बार करें, अच्छा अभ्यास हो जाने पर बिना वज्रासन के भी चलते-फिरते या बैठे हुए यह दोनों क्रियाएं की जा सकती हैं।
(4) मैनफल, मुलहठी और कपूर तीनों को समान मात्रा में खूब कूट-पीसकर महीन करके मिला लें और पोटली बना लें। चुटकीभर माजूफल का महीन पिसा चूर्ण जरा से शहद में मिला लें। इस लेप को अंगुली से योनि के अंदर ठीक प्रकार सब तरफ लगाकर यह पोटली सोते समय योनि के अंदर सरकाकर रख दें। प्रातः इससे निकालकर फेंक दें।
(5) कूठ, धाय के फूल, बड़ी हरड़, फिटकरी, माजूफल, लोध्र, भांग और अनार के छिलके सब 10-10 ग्राम, इन्हें कूट-पीसकर चूर्ण कर लें 250 ग्राम शराब में डालकर 7 दिन तक रखें। दिन में 2-3 बार हिला दिया करें। आठवें दिन कपड़े से छानकर शीशी में भर लें इसमें रूई का फाहा भिगोकर योनि में अंदर चारों तरफ लगाने से योनि की शिथिलता, विस्तीर्ण तथा दीर्घमुख होने की स्थिति दूर होती है। आवश्यकता रहे तब तक यह प्रयोग
 करते रहना चाहिए।
यह सभी उपाय एक से बढ़कर एक हैं, एक बार में सिर्फ एक ही उपाय करें। ये सभी परीक्षित नुस्खे हैं। 
मजाक उड़ाती हैं सभी
प्रश्न : मेरे स्तन बहुत छोटे हैं, सहेलियाँ मजाक उड़ाती हैं, इन्हें सामान्य अवस्था में लाने का उपाय बताएँ ?
उत्तर : आप गम्भारी की छाल 50 ग्राम लेकर कूट-पीसकर खूब महीन बारीक चूर्ण कर लें। इसे जैतून के तेल में मिलाकर गाढ़ा लेप बना लें। इसे सुबह नहाने से पहले स्तनों पर लगाकर मालिश करें। रात को सोते समय लेप कर मालिश करें और सुबह स्नान करते समय धो लें। यदि शरीर दुबला पतला हो तो पौष्टिक आहार लें। 3-4 माह में स्तनों का आकार सुडौल और पुष्ट हो जाएगा।
प्रश्न : विवाह को छह वर्ष हो गए हैं, अभी तक पत्नी गर्भवती नहीं हो सकी है। हम दोनों यौन विषय में बहुत ज्यादा संतुष्ट हैं, हमने जाँच करवाई तो मेरी जाँच रिपोर्ट में यह दोष पाया गया कि वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम है और उनकी जीवनी शक्ति का प्रतिशत भी कम है। कोई इलाज बताएँ ?
उत्तर : आप यह प्रयोग करें- वीर्यशोधन वटी, दिव्य रसायन वटी, एडीजुआ और पुष्पधन्वा रस। चारों 1-1 गोली सुबह-शाम मीठे दूध के साथ लें। इसके साथ दो दवाएँ होम्‍ियोपैथी की भी लेनी हैं। सप्ताह में एक दिन कोनियम 200 की 6-7 गोली मुंह में डालकर चूस लें। सिर्फ एक ही बार लें। सप्ताह के शेष छह दिन तक डेमियाना टरनेरा मदद टिंचर की 10-15 बूंद आधा कप पानी में डालकर सुबह-शाम पिएँ। जिस दिन कोनियम 200 लें उस
 दिन डोमियाना न लें, बाकी के छह दिनों में ही लें। होम्योपैथिक दवा लेने में परहेज यह है कि दवा लेने से आधा घंटा पहले और दवा लेने के आधा घंटा बाद तक के एक घंटे के समय में कुछ भी खाएँ-पिएँ नहीं। यह दोनों प्रकार के इलाज कम से कम छह माह तक लें और फिर अपने वीर्य की पैथोलॉजिकल जाँच करा लें।
प्रश्न : ऋतुकाल का आरंभ ऋतु स्राव बंद होने पर मानें या जिस दिन से ऋतु स्राव शुरू हो उस दिन से ?
उत्तर : ऋतुकाल तो पहले दिन से ही माना जाता है, जो कि 16 दिन का होता है, लेकिन गर्भाधान और सहवास के लिए सातवीं रात्रि से लेकर ऋतुकाल के अंतिम सोलहवें दिन तक की कुल 13 रात्रियाँ सेवन योग्य होती हैं। 16वीं रात्रि को गर्भाशय का मुँह बंद होने की संभावना भी रहती है, इसलिए 16वीं रात्रि को उपयोग में लेने का निर्देश नहीं दिया जाता, वरना यह रात्रि भी पुत्र प्राप्ति के लिए उपयोगी मानी गई है।
 गर्भाधान करने के लिए रात्रियों की गणना करने के लिए पहली रात उसी को गिनना चाहिए जिस दिन ऋतु स्राव शुरू हुआ हो। 
पुत्र प्राप्ति हेतु गर्भाधान का तरीका
हमारे पुराने आयुर्वेद ग्रंथों में पुत्र-पुत्री प्राप्ति हेतु दिन-रात, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष तथा माहवारी के दिन से सोलहवें दिन तक का महत्व बताया गया है। धर्म ग्रंथों में भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
यदि आप पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं और वह भी गुणवान, तो हम आपकी सुविधा के लिए हम यहाँ माहवारी के बाद की विभिन्न रात्रियों की महत्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं।
* चौथी रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र अल्पायु और दरिद्र होता है।
* पाँचवीं रात्रि के गर्भ से जन्मी कन्या भविष्य में सिर्फ लड़की पैदा करेगी।
* छठवीं रात्रि के गर्भ से मध्यम आयु वाला पुत्र जन्म लेगा।
* सातवीं रात्रि के गर्भ से पैदा होने वाली कन्या बांझ होगी।
* आठवीं रात्रि के गर्भ से पैदा पुत्र ऐश्वर्यशाली होता है।
* नौवीं रात्रि के गर्भ से ऐश्वर्यशालिनी पुत्री पैदा होती है।
* दसवीं रात्रि के गर्भ से चतुर पुत्र का जन्म होता है।
* ग्यारहवीं रात्रि के गर्भ से चरित्रहीन पुत्री पैदा होती है।
* बारहवीं रात्रि के गर्भ से पुरुषोत्तम पुत्र जन्म लेता है।
* तेरहवीं रात्रि के गर्म से वर्णसंकर पुत्री जन्म लेती है।
* चौदहवीं रात्रि के गर्भ से उत्तम पुत्र का जन्म होता है।
* पंद्रहवीं रात्रि के गर्भ से सौभाग्यवती पुत्री पैदा होती है।
* सोलहवीं रात्रि के गर्भ से सर्वगुण संपन्न, पुत्र पैदा होता है। 
व्यास मुनि ने इन्हीं सूत्रों के आधार पर पर अम्बिका, अम्बालिका तथा दासी के नियोग (समागम) किया, जिससे धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म हुआ। महर्षि मनु तथा व्यास मुनि के उपरोक्त सूत्रों की पुष्टि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक 'संस्कार विधि' में स्पष्ट रूप से कर दी है। प्राचीनकाल के महान चिकित्सक वाग्भट तथा भावमिश्र ने महर्षि मनु के उपरोक्त कथन की पुष्टि
 पूर्णरूप से की है।
* दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है।
* 2500 वर्ष पूर्व लिखित चरक संहिता में लिखा हुआ है कि भगवान अत्रिकुमार के कथनानुसार स्त्री में रज की सबलता से पुत्री तथा पुरुष में वीर्य की सबलता से पुत्र पैदा होता है।
* प्राचीन संस्कृत पुस्तक 'सर्वोदय' में लिखा है कि गर्भाधान के समय स्त्री का दाहिना श्वास चले तो पुत्री तथा बायां श्वास चले तो पुत्र होगा।
* यूनान के प्रसिद्ध चिकित्सक तथा महान दार्शनिक अरस्तु का कथन है कि पुरुष और स्त्री दोनों के दाहिने अंडकोष से लड़का तथा बाएं से लड़की का जन्म होता है।
* चन्द्रावती ऋषि का कथन है कि लड़का-लड़की का जन्म गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष के दायां-बायां श्वास क्रिया, पिंगला-तूड़ा नाड़ी, सूर्यस्वर तथा चन्द्रस्वर की स्थिति पर निर्भर करता है।



संतान चाहिए? ये ज्योतिषीय उपाय करें...

यह मुख्य विषय प्रारब्ध एवं भाग्य संबंधी होता है। किंतु ठीक उपाए कर लिए जाएं तो संतान की प्राप्ती निश्चित होती है।

पहला उपाए- संतान गोपाल मंत्र के सवा लाख जप शुभ मुहूर्त में शुरू करें। साथ ही बालमुकुंद (लड्डूगोपाल जी) भगवान की पूजन करें। उनको माखन-मिश्री का भोग लगाएं। गणपति का स्मरण करके शुद्ध घी का दीपक प्रज्जवलित करके निम्न मंत्र का जप करें।
मंत्र
ऊं क्लीं देवकी सूत गोविंदो वासुदेव जगतपते देहि मे,
तनयं कृष्ण त्वामहम् शरणंगता: क्लीं ऊं।।

दूसरा उपाए- सपत्नीक कदली (केले) वृक्ष के नीचे बालमुकुंद भगवान की पूजन करें। कदली वृक्ष की पूजन करें, गुड़, चने का भोग लगाएं। 21 गुरुवार करने से संतान की प्राप्ती होती है।

तीसरा उपाए- 1 प्रदोष का व्रत करें, प्रत्येक प्रदोष को भगवान शंकर का रुद्राभिषेक करने से संतान की प्राप्त होती है।

चौथा उपाए- गरीब बालक, बालिकाओं को गोद लें, उन्हें पढ़ाएं, लिखाएं, वस्त्र, कापी, पुस्तक, खाने पीने का खर्चा दो वर्ष तक उठाने से संतान की प्राप्त होती है।

पांचवां उपाए- आम, बील, आंवले, नीम, पीपल के पांच पौधे लगाने से संतान की प्राप्ति होती है।


स्वास्थ्य के लिये टोटके
1॰ सदा स्वस्थ बने रहने के लिये रात्रि को पानी किसी लोटे या गिलास में सुबह उठ कर पीने के लिये रख दें। उसे पी कर बर्तन को उल्टा रख दें तथा दिन में भी पानी पीने के बाद बर्तन (गिलास आदि) को उल्टा रखने से यकृत सम्बन्धी परेशानियां नहीं होती तथा व्यक्ति सदैव स्वस्थ बना रहता है।
2॰ हृदय विकार, रक्तचाप के लिए एकमुखी या सोलहमुखी रूद्राक्ष श्रेष्ठ होता है। इनके न मिलने पर ग्यारहमुखी, सातमुखी अथवा पांचमुखी रूद्राक्ष का उपयोग कर सकते हैं। इच्छित रूद्राक्ष को लेकर श्रावण माह में किसी प्रदोष व्रत के दिन, अथवा सोमवार के दिन, गंगाजल से स्नान करा कर शिवजी पर चढाएं, फिर सम्भव हो तो रूद्राभिषेक करें या शिवजी पर “ॐ नम: शिवाय´´ बोलते हुए दूध से अभिषेक कराएं। इस प्रकार अभिमंत्रित रूद्राक्ष को काले डोरे में डाल कर गले में पहनें।
3॰ जिन लोगों को 1-2 बार दिल का दौरा पहले भी पड़ चुका हो वे उपरोक्त प्रयोग संख्या 2 करें तथा निम्न प्रयोग भी करें :-एक पाचंमुखी रूद्राक्ष, एक लाल रंग का हकीक, 7 साबुत (डंठल सहित) लाल मिर्च को, आधा गज लाल कपड़े में रख कर व्यक्ति के ऊपर से 21 बार उसार कर इसे किसी नदी या बहते पानी में प्रवाहित कर दें।
4॰ किसी भी सोमवार से यह प्रयोग करें। बाजार से कपास के थोड़े से फूल खरीद लें। रविवार शाम 5 फूल, आधा कप पानी में साफ कर के भिगो दें। सोमवार को प्रात: उठ कर फूल को निकाल कर फेंक दें तथा बचे हुए पानी को पी जाएं। जिस पात्र में पानी पीएं, उसे उल्टा कर के रख दें। कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक स्वास्थ्य लाभ अनुभव करेंगे।
5॰ घर में नित्य घी का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय लौ पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर हो या दीपक के मध्य में (फूलदार बाती) बाती लगाना शुभ फल देने वाला है।
6॰ रात्रि के समय शयन कक्ष में कपूर जलाने से बीमारियां, दु:स्वपन नहीं आते, पितृ दोष का नाश होता है एवं घर में शांति बनी रहती है।
7॰ पूर्णिमा के दिन चांदनी में खीर बनाएं। ठंडी होने पर चन्द्रमा और अपने पितरों को भोग लगाएं। कुछ खीर काले कुत्तों को दे दें। वर्ष भर पूर्णिमा पर ऐसा करते रहने से गृह क्लेश, बीमारी तथा व्यापार हानि से मुक्ति मिलती है।
8॰ रोग मुक्ति के लिए प्रतिदिन अपने भोजन का चौथाई हिस्सा गाय को तथा चौथाई हिस्सा कुत्ते को खिलाएं।
9॰ घर में कोई बीमार हो जाए तो उस रोगी को शहद में चन्दन मिला कर चटाएं।
10॰ पुत्र बीमार हो तो कन्याओं को हलवा खिलाएं। पीपल के पेड़ की लकड़ी सिरहाने रखें।
11॰ पत्नी बीमार हो तो गोदान करें। जिस घर में स्त्रीवर्ग को निरन्तर स्वास्थ्य की पीड़ाएँ रहती हो, उस घर में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी श्रद्धापूर्वक देखशल करने से रोग पीड़ाएँ समाप्त होती है।
12॰ मंदिर में गुप्त दान करें।
13॰ रविवार के दिन बूंदी के सवा किलो लड्डू मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटे।
14॰ सदैव पूर्व या दक्षिण दिषा की ओर सिर रख कर ही सोना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर सिर कर के सोने वाले व्यक्ति में चुम्बकीय बल रेखाएं पैर से सिर की ओर जाती हैं, जो अधिक से अधिक रक्त खींच कर सिर की ओर लायेंगी, जिससे व्यक्ति विभिन्न रोंगो से मुक्त रहता है और अच्छी निद्रा प्राप्त करता है।
15॰ अगर परिवार में कोई परिवार में कोई व्यक्ति बीमार है तथा लगातार औषधि सेवन के पश्चात् भी स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है, तो किसी भी रविवार से आरम्भ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का पेड़ा तथा एक लोटा पानी व्यक्ति के सिर के ऊपर से उबार कर जल को पौधे में डाल दें तथा पेड़ा गाय को खिला दें। अवश्य ही इन 3 दिनों के अन्दर व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगेगा। अगर टोटके की अवधि में रोगी ठीक हो जाता है, तो भी प्रयोग को पूरा करना है, बीच में रोकना नहीं चाहिए।
16॰ अमावस्या को प्रात: मेंहदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। तेल का चौमुंहा दीपक बना कर 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें। महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर रोग-शोक दूर करने की भगवान से प्रार्थना कर, घर के दक्षिण की ओर दूर सूखे कुएं में नींबू सहित डाल दें। पीछे मुड़कर नहीं देखें। उस दिन एक ब्राह्मण -ब्राह्मणी को भोजन करा कर वस्त्रादि का दान भी कर दें। कुछ दिन तक पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा तथा दान-पुण्य भी करते रहें। इससे घर की बीमारी, भूत बाधा, मानसिक अशांति निश्चय ही दूर होती है।
17॰ किसी पुरानी मूर्ति के ऊपर घास उगी हो तो शनिवार को मूर्ति का पूजन करके, प्रात: उसे घर ले आएं। उसे छाया में सुखा लें। जिस कमरे में रोगी सोता हो, उसमें इस घास में कुछ धूप मिला कर किसी भगवान के चित्र के आगे अग्नि पर सांय, धूप की तरह जलाएं और मन्त्र विधि से ´´ ॐ माधवाय नम:। ॐ अनंताय नम:। ॐ अच्युताय नम:।´´ मन्त्र की एक माला का जाप करें। कुछ दिन में रोगी स्वस्थ हो जायेगा। दान-धर्म और दवा उपयोग अवश्य करें। इससे दवा का प्रभाव बढ़ जायेगा।
18॰ अगर बीमार व्यक्ति ज्यादा गम्भीर हो, तो जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिला कर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहाँ मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम कर के रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है, केवल भैंसे को ही श्रेष्ठ रहती है। शनि और मंगलवार को ही यह कार्य करें।
19॰ पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। ऐसा किसी भी वार से शुरू करके 7 दिन तक करें। बीमार व्यक्ति को आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा।
20॰ किसी कब्र या दरगाह पर सूर्यास्त के पश्चात् तेल का दीपक जलाएं। अगरबत्ती जलाएं और बताशे रखें, फिर वापस मुड़ कर न देखें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।
21॰ किसी तालाब, कूप या समुद्र में जहां मछलियाँ हों, उनको शुक्रवार से शुक्रवार तक आटे की गोलियां, शक्कर मिला कर, चुगावें। प्रतिदिन लगभग 125 ग्राम गोलियां होनी चाहिए। रोगी ठीक होता चला जायेगा।
22॰ शुक्रवार रात को मुठ्ठी भर काले साबुत चने भिगोयें। शनिवार की शाम काले कपड़े में उन्हें बांधे तथा एक कील और एक काले कोयले का टुकड़ा रखें। इस पोटली को किसी तालाब या कुएं में फेंक दें। फेंकने से पहले रोगी के ऊपर से 7 बार वार दें। ऐसा 3 शनिवार करें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।
23॰ सवा सेर (1॰25 सेर) गुलगुले बाजार से खरीदें। उनको रोगी पर से 7 बार वार कर चीलों को खिलाएं। अगर चीलें सारे गुलगुले, या आधे से ज्यादा खा लें तो रोगी ठीक हो जायेगा। यह कार्य शनि या मंगलवार को ही शाम को 4 और 6 के मध्य में करें। गुलगुले ले जाने वाले व्यक्ति को कोई टोके नहीं और न ही वह पीछे मुड़ कर देखे।
24॰ यदि लगे कि शरीर में कष्ट समाप्त नहीं हो रहा है, तो थोड़ा सा गंगाजल नहाने वाली बाल्टी में डाल कर नहाएं।
25॰ प्रतिदिन या शनिवार को खेजड़ी की पूजा कर उसे सींचने से रोगी को दवा लगनी शुरू हो जाती है और उसे धीरे-धीरे आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। यदि प्रतिदिन सींचें तो 1 माह तक और केवल शनिवार को सींचें तो 7 शनिवार तक यह कार्य करें। खेजड़ी के नीचे गूगल का धूप और तेल का दीपक जलाएं।
26॰ हर मंगल और शनिवार को रोगी के ऊपर से इमरती को 7 बार वार कर कुत्तों को खिलाने से धीरे-धीरे आराम मिलता है। यह कार्य कम से कम 7 सप्ताह करना चाहिये। बीच में रूकावट न हो, अन्यथा वापस शुरू करना होगा।
27॰ साबुत मसूर, काले उड़द, मूंग और ज्वार चारों बराबर-बराबर ले कर साफ कर के मिला दें। कुल वजन 1 किलो हो। इसको रोगी के ऊपर से 7 बार वार कर उनको एक साथ पकाएं। जब चारों अनाज पूरी तरह पक जाएं, तब उसमें तेल-गुड़ मिला कर, किसी मिट्टी के दीये में डाल कर दोपहर को, किसी चौराहे पर रख दें। उसके साथ मिट्टी का दीया तेल से भर कर जलाएं, अगरबत्ती जलाएं। फिर पानी से उसके चारों ओर घेरा बना दें। पीछे मुड़ कर न देखें। घर आकर पांव धो लें। रोगी ठीक होना शुरू हो जायेगा।
28॰ गाय के गोबर का कण्डा और जली हुई लकड़ी की राख को पानी में गूंद कर एक गोला बनाएं। इसमें एक कील तथा एक सिक्का भी खोंस दें। इसके ऊपर रोली और काजल से 7 निशान लगाएं। इस गोले को एक उपले पर रख कर रोगी के ऊपर से 3 बार उतार कर सुर्यास्त के समय मौन रह कर चौराहे पर रखें। पीछे मुड़ कर न देखें।
29॰ शनिवार के दिन दोपहर को 2॰25 (सवा दो) किलो बाजरे का दलिया पकाएं और उसमें थोड़ा सा गुड़ मिला कर एक मिट्टी की हांडी में रखें। सूर्यास्त के समय उस हांडी को रोगी के शरीर पर बायें से दांये 7 बार फिराएं और चौराहे पर मौन रह कर रख आएं। आते-जाते समय पीछे मुड़ कर न देखें और न ही किसी से बातें करें।
30॰ धान कूटने वाला मूसल और झाडू रोगी के ऊपर से उतार कर उसके सिरहाने रखें।
31॰ सरसों के तेल को गरम कर इसमें एक चमड़े का टुकड़ा डालें, पुन: गर्म कर इसमें नींबू, फिटकरी, कील और काली कांच की चूड़ी डाल कर मिट्टी के बर्तन में रख कर, रोगी के सिर पर फिराएं। इस बर्तन को जंगल में एकांत में गाड़ दें।
32॰ घर से बीमारी जाने का नाम न ले रही हो, किसी का रोग शांत नहीं हो रहा हो तो एक गोमती चक्र ले कर उसे हांडी में पिरो कर रोगी के पलंग के पाये पर बांधने से आश्चर्यजनक परिणाम मिलता है। उस दिन से रोग समाप्त होना शुरू हो जाता है।
33॰ यदि पर्याप्त उपचार करने पर भी रोग-पीड़ा शांत नहीं हो रही हो अथवा बार-बार एक ही रोग प्रकट होकर पीड़ित कर रहा हो तथा उपचार करने पर भी शांत हो जाता हो, ऐसे व्यक्ति को अपने वजन के बराबर गेहू¡ का दान रविवार के दिन करना चाहिए। गेहूँ का दान जरूरतमंद एवं अभावग्रस्त व्यक्तियों को ही करना चाहिए।

आजकल बच्चे नशे या कुकर्मों में लिप्त होकर अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। काम नहीं करते हैं और यूं ही समय बर्बाद करते हैं। कहना भी नहीं मानते हैं। अपने माता-पिता की चिन्ता का कारण बने हुए हैं। 
दीपावली, ग्रहण या किसी शुभ मुहूर्त्त में इस मन्त्र को सिद्ध कर लें। अमुक के स्थान पर जिस बच्चे को वश में करना है या कन्ट्रोल में लाना है उसका नाम लें। 
मन्त्र की दस माला करने के बाद लौंग, इलायची या मिसरी को 21 बार मन्त्र पढ़कर अभिमन्त्रित कर लें। बाद मे जिसका नाम लें उसे चाय में या प्रसाद में देकर खिला दें। वह बच्चा वश में हो जाएगा और आज्ञा मानेगा। यह प्रयोग पहली बार में सफल न हो तो पुनः करें। मन्त्र इस प्रकार है-
ऊं क्लीम्‌ क्लीम्‌ अमुकं मम वश्यं कुरु कुरु स्वाहा।












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